सवाल यह है कि अरावली की पहाड़ियों को बचाने उदयपुर के जनप्रतिनिधि ही खुलकर नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा ?: अरावली संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने लिए सुझाव
देवेंद्र शर्मा उदयपुर (एआर लाइव न्यूज)। अरावली की पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर बनी सुप्रीम कोर्ट की मौजूदगी में उदयपुर में जिला परिषद सभागार में हुए जन संवाद के दौरान दो तरह की राय उभर कर सामने आयी। हालांकि सबसे बड़ी बात यह रही कि इस दौरान नाथद्धारा विधायक विश्वराजसिंह मेवाड़ एक मात्र ऐसे जनप्रतिनिधि थे जिन्होंने अरावली की पहाड़ियों को बचाने खुलकर अपनी बात रखी। | save Aravalli Supreme Court committee in Udaipur
विश्वराज सिंह मेवाड़ के तर्काें में अरावली की पहाड़ियों को छलनी करने वालों के हित को कोई तव्वजों नहीं मिली। दूसरी तरफ उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन और उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा का ढुलमुल रवैया नजर आया। ये दोनों जनप्रतिनिधि यह भी खुलकर नहीं बोल पाए कि उदयपुर में किस कदर अरावली की पहाड़ियों को बेतरतीब काटा जा रहा है। इससे भी चिंताजनक बात यह है कि इतने संवेदनशील विषय पर चर्चा के बावजूद उदयपुर जिले के अधिकांश जिम्मेदार जनप्रतिनिधि इस जन संवाद में नहीं पहुंचे। जनसंवाद के दौरान जो लोग खनन उद्योग से जुड़े हुए है वो खनन को आर्थिक विकास का आधार बताते हुए अरावली संरक्षण की नीति पर जोर दे रहे थे।
इस अवसर पर कमेटी सदस्य एवं भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. सुभाष आशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौड़, प्रधान मुख्य वन संरक्षक टेरिटोरियल एसआर यादव और उदयपुर कलेक्टर गौरव अग्रवाल भी मौजूद थे। | Aravalli Protection Supreme Court Committee in udaipur | save Aravalli Supreme Court committee in Udaipur
पर्यावरण और अरावली हमारी रक्षा करते हैं, न कि हम उनकी : विधायक विश्वराजसिंह मेवाड़
जन संवाद के दौरान सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के सामने अरावली पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर सबसे महत्पपूर्ण मुद्दे नाथद्वारा विधायक विश्वराजसिंह मेवाड़ ने रखे। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि पर्यावरण और अरावली हमारी रक्षा करते हैं, न कि हम उनकी। प्रकृति के नियम किसी भी सिद्धांत से कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल कागजों पर घोषित करने से नहीं होगा। अरावली के संरक्षण में किसी भी प्रकार की अस्पष्टता या दोहरे मापदंड की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।
विकास की कीमत पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से नहीं चुकाई जा सकती
विश्वराजसिंह मेवाड ने कहा कि विकास और रोजगार आवश्यक हैं, लेकिन विकास की कीमत पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से नहीं चुकाई जा सकती। अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि राजस्थान के पर्यावरणीय संतुलन, जल संरक्षण और जैव विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक सुरक्षा कवच है।
प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन की अनुमति नहीं होनी चाहिए
मेवाड ने कहा कि अरावली एक सतत और प्राकृतिक पर्वत श्रृंखला है, जिसे सुविधानुसार अलग -अलग परिभाषाओं में बांटने के बजाय इसके संरक्षण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। व्यावसायिक गतिविधि और व्यावसायिक दोहन के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। यदि किसी क्षेत्र में नियमानुसार व्यावसायिक उपयोग की अनुमति दी जाती है तो उसका अर्थ प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन की अनुमति नहीं होना चाहिए।
पहाड़ियों की कटाई पर प्रशासन सख्ती से लागू करे नियम
विधायक विश्वराजसिंह मेवाड़ ने कहा कि उदयपुर से राजसमंद की ओर जाने वाले मार्ग सहित कई क्षेत्रों में पहाड़ियों की कटाई और अनियंत्रित निर्माण जैसी गतिविधियां चिंता का विषय हैं। केवल नियम और नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका धरातल पर समान रूप से और सख्ती से पालन होना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग अलग दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए। एक समान, स्पष्ट और व्यवहारिक नीति बनाई जाए, जिसे प्रशासन निष्पक्षता और कठोरता के साथ लागू करे।
क्या बोले शहर विधायक ताराचंद जैन
कमेटी के सामने उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन ने कहा कि अरावली हमारी प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहर है और इसका संरक्षण बेहद आवश्यक है। वैध रूप से अरावली के लगभग एक प्रतिशत क्षेत्र में ही खनन हो रहा है, जिससे सरकार को 6 हजार 500 करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हो रहा है तथा हजारों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिल रहा है। वैध गतिविधियों और अवैध खनन के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए अवैध खनन करने वालों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई की जानी चाहिए।
ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा का तर्क
उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा ने कहा कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की समस्याओं का समाधान भी अरावली संरक्षण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि बंद पड़ी खदानों का उपयोग हरियाली विकास एवं पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यों के लिए किया जा सकता है। इससे अनुपयोगी क्षेत्रों का पुनर्विकास करते हुए पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत किया जा सकेगा।
श्याम सुंदर पालीवाल ने सामूहिक प्रयासों की जरूरत बताई
पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल ने कहा कि अरावली का संरक्षण किसी एक विभाग या संस्था के प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि सरकार, स्थानीय समुदाय, जनप्रतिनिधियों, पर्यावरणविदों और अन्य हितधारकों के समन्वित प्रयासों से ही इसके संरक्षण का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
रोजगार और पर्यावरण के बीच संतुलन की मांग
हितधारकों ने कहा कि अरावली के संरक्षण की नीतियां तैयार करते समय स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ साथ सदियों से इस क्षेत्र पर निर्भर समुदायों की आवश्यकताओं को भी समझना जरूरी है।विकास के साथ साथ प्रकृति का संरक्षण भी आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका दोनों को साथ लेकर चलने वाला संतुलित एवं व्यावहारिक तंत्र विकसित किया जाना चाहिए। कुछ हितधारकों ने बताया कि आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में वैध खनन गतिविधियों से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है तथा इससे लोगों के पलायन को रोकने में भी मदद मिली है।
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