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दिव्यांग ग्राहक ब्रांच बदले या बैंक अपनी व्यवस्था? बैंक के खिलाफ मामला अदालत पहुंचा

Lucky Jain by Lucky Jain
August 26, 2026
Reading Time: 1 min read
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HDFC बैंक को सिविल न्यायालय का समन, डॉ. अरविंदर सिंह ने उठाया समान और सुगम बैंकिंग का अधिकार

उदयपुर, एआर लाइव न्यूज। दिव्यांगजनों के लिए एकसमान, स्वतंत्र, सम्मानजनक और बाधामुक्त बैंकिंग सेवाओं का मुद्दा अब न्यायालय तक पहुंच गया है। पैनासिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स के संस्थापक एवं अध्यक्ष, दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ता और अर्थ डायग्नोस्टिक्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अरविंदर सिंह ने एचडीएफसी बैंक लिमिटेड और संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध उदयपुर के सिविल न्यायालय में वाद दायर किया है। मामले में न्यायालय की ओर से संबंधित पक्षों को समन जारी किए गए हैं। Dr Arvinder Singh | Divyang Banking Rights | HDFC Bank

बैंक ब्रांच तक स्वतंत्र पहुंच का उठाया मुद्दा

मामला केवल एक ग्राहक की सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि दिव्यांगजनों के समान बैंकिंग अधिकार और संस्थागत सुगम्यता से जुड़ा है। डॉ. अरविंदर सिंह स्वयं दिव्यांगजन हैं। उन्होंने संबंधित एचडीएफसी बैंक शाखा में स्वतंत्र रूप से प्रवेश करने, बैंकिंग सेवाओं का उपयोग करने और लॉकर तक सुविधाजनक पहुंच में आ रही समस्याओं को बैंक के समक्ष रखा।

डॉ. सिंह की ओर से ई-मेल और अन्य माध्यमों से बैंक से रैंप, सुलभ लॉकर और अन्य दिव्यांगजन-अनुकूल व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया। हालांकि, बैंक की ओर से दिव्यांगजन-अनुकूल व्यवस्थाएं करने के बजाए उन्हें ही वैकल्पिक रूप से खाता किसी दूसरी शाखा में स्थानांतरित करने की सलाह दे दी गयी।

बैंक के जवाब ने खड़ा किया सामाजिक और कानूनी सवाल

बैंक के इस जवाब ने एक व्यापक सामाजिक और कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है—यदि कोई बैंक शाखा दिव्यांग ग्राहक के लिए सुलभ नहीं है, तो क्या ग्राहक को अपनी शाखा बदलनी चाहिए या बैंकिंग व्यवस्था को स्वयं अधिक समावेशी बनना चाहिए?

दायर वाद में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के साथ बैंकिंग सेवाओं में सुगम्यता से संबंधित भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों और नियामकीय प्रावधानों का भी उल्लेख किया गया है। इन प्रावधानों के तहत बैंकों से दिव्यांगजनों और व्हीलचेयर उपयोगकर्ताओं के लिए शाखाओं एवं एटीएम तक सुगम पहुंच सुनिश्चित करने तथा आवश्यक भौतिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जाती है।

‘सुगम्यता विशेष कृपा नहीं, अधिकार’

डॉ. अरविंदर सिंह ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक बैंक के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच और व्यवस्था में बदलाव के लिए है, जिसमें दिव्यांग व्यक्ति को सुविधा देने के बजाय उसे अपना स्थान या व्यवहार बदलने के लिए कहा जाता है।

उन्होंने कहा, “सुगम्यता कोई विशेष कृपा नहीं, बल्कि समानता, गरिमा और स्वतंत्रता का अधिकार है।” उन्होंने कहा कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में इस संबंध में स्पष्ट कानूनी प्रावधान हैं और उल्लंघन की स्थिति में दंडात्मक प्रावधान भी मौजूद हैं।

डॉ. सिंह के अनुसार, केवल बैंक खाता खोलने की अनुमति मिल जाना समान बैंकिंग नहीं है। यदि कोई व्यक्ति शाखा में स्वतंत्र रूप से प्रवेश नहीं कर सकता, काउंटर या लॉकर तक नहीं पहुंच सकता अथवा प्रत्येक कदम पर किसी अन्य व्यक्ति की सहायता लेने को मजबूर है, तो वास्तविक वित्तीय समावेशन अधूरा रह जाता है।

एक्सेसिबिलिटी ऑडिट की मांग

पैनासिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने बैंकिंग संस्थानों से न्यायिक विवाद की प्रतीक्षा करने के बजाय अपनी शाखाओं का एक्सेसिबिलिटी ऑडिट कराने की अपील की है। संगठन ने रैंप, सुलभ काउंटर, लॉकर, शौचालय, संकेतक, डिजिटल बैंकिंग सेवाओं और अन्य सुविधाओं की समीक्षा के साथ बैंक कर्मचारियों को दिव्यांगजन-संवेदनशीलता का प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया है।

यह मामला अब इस व्यापक सवाल की ओर ध्यान खींच रहा है कि भारत में वित्तीय समावेशन केवल बैंकिंग सेवाओं की उपलब्धता तक सीमित रहेगा या दिव्यांग ग्राहकों के लिए वास्तविक, स्वतंत्र और बाधामुक्त बैंकिंग अनुभव भी सुनिश्चित किया जाएगा।

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