उदयपुर,एआर लाइव न्यूज। पेसिफिक विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की ओर से “प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण, अध्ययन और आधुनिक संदर्भों में उसके उपयोग” को लेकर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हुआ। “प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा : ज्ञान एवं विज्ञान के आधुनिक आयाम” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश-विदेश के शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। संगोष्ठी में कुल 222 शोध पत्रों का वाचन किया गया। | governor haribhau bagde | pacific university udaipur
समापन समारोह के मुख्य अतिथि राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ किशनराव बागड़े ने कहा कि सम्पूर्ण विश्व में प्राचीन भारतीय ज्ञान पर शोध और अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा आज भी अक्षुण्ण है और विदेशी दार्शनिकों, भाषाविदों तथा लेखकों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषा, दर्शन और परमाणुवाद सहित विभिन्न क्षेत्रों की उपलब्धियों को स्वीकार किया है।
राज्यपाल ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के ऐतिहासिक स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि अंग्रेजों के आगमन से पहले देश में गुरुकुल, विद्यालय और आश्रम ज्ञान के प्रसार के प्रमुख केंद्र थे। उन्होंने औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था के प्रभाव और भारतीय संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान तथा पारंपरिक उद्योगों पर पड़े प्रभाव का भी उल्लेख किया। अपने संबोधन में उन्होंने बप्पा रावल से जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रस्तुत किए।
भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक नवाचार का संबंध
पेसिफिक विश्वविद्यालय समूह के अध्यक्ष प्रो. बीपी शर्मा ने कहा कि प्राचीन भारतीय ज्ञान आज आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों के लिए संदर्भ प्रदान कर सकता है। उन्होंने संस्कृत वाङ्मय में निहित ज्ञान और उस पर देश-विदेश में हो रहे शोध का उल्लेख किया।
पेसिफिक विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. हेमंत कोठारी ने अकादमिक और वैज्ञानिक समुदाय से भारतीय साझा विरासत को केवल ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में देखने के बजाय आधुनिक वैज्ञानिक पुनर्जागरण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में इसके संभावित योगदान पर शोध करने का आह्वान किया।
प्राचीन भारतीय कला और स्थापत्य पर भी चर्चा
ऑस्ट्रेलिया से जुड़ी शोधकर्ता रेबेका टेलर, जिन्होंने अल्बर्टा यूनिवर्सिटी और पुर्तगाल का प्रतिनिधित्व किया, ने प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों की प्रासंगिकता पर विचार रखे। उन्होंने प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और मंदिर स्थापत्य में मौजूद ज्यामितीय संरचनाओं तथा आध्यात्मिक आयामों की आधुनिक कलात्मक अभिव्यक्तियों से तुलना की।
समारोह में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. कैलाश डागा, आयोजन सचिव प्रो. अजातशत्रु सिंह शिवरती, प्रो. प्रदीप सिंह (एम.एस. विश्वविद्यालय, बड़ौदा), प्रो. अखिलेश (इंदौर), इतिहासकार डॉ. जे.के. ओझा, डॉ. राजेंद्र नाथ पुरोहित, लक्ष्मण सिंह करनावत, प्रो. दिग्विजय भटनागर, डॉ. मनोज दादिच, डॉ. राम सिंह राठौड़, डॉ. सुरेंद्र चौहान, डॉ. अहमद (सूडान), डॉ. राकेश रामावत और इंदर सिंह सहित कई शिक्षाविद मौजूद रहे।


