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डॉ. अरविंदर सिंह ने उठाया सवाल? डिजिटल बैंकिंग के दौर में दिव्यांगजन अब भी बैंक की सीढ़ियों पर क्यों अटके?

Lucky Jain by Lucky Jain
June 20, 2026
Reading Time: 3 mins read
dr arvinder singh ask banking-inaccessibility-disabled-persons-india-banks


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एआर लाइव न्यूज। भारत आज डिजिटल अर्थव्यवस्था, वित्तीय समावेशन और तकनीकी क्रांति के नए युग में प्रवेश कर चुका है। सरकार डिजिटल इंडिया, कैशलेस लेन-देन और सर्वसमावेशी बैंकिंग व्यवस्था को लेकर लगातार उपलब्धियां गिना रही है। बैंकिंग क्षेत्र भी मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग, वीडियो केवाईसी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवाओं के विस्तार का दावा कर रहा है। लेकिन इन तमाम दावों के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी अनुत्तरित है—क्या देश के करोड़ों दिव्यांग नागरिक वास्तव में इस वित्तीय क्रांति का हिस्सा बन पाए हैं? | Banking inaccessibility for Persons with Disabilities | Arth CEO Dr. Arvinder Singh

यह प्रश्न हाल ही में पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स के अध्यक्ष एवं अर्थ डायग्नोस्टिक्स के सीईओ डॉ. अरविंदर सिंह ने उठाया है। उनका कहना है कि डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में भी अनेक बैंक शाखाएं दिव्यांगजनों के लिए मूलभूत रूप से असुगम बनी हुई हैं। उदयपुर के मधुबन क्षेत्र सहित देश के अनेक हिस्सों में बैंक शाखाओं में रैम्प, व्हीलचेयर-अनुकूल प्रवेश, सुगम लॉकर, टॉकिंग एटीएम, ब्रेल कीपैड, स्क्रीन रीडर-अनुकूल डिजिटल सेवाएं और प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव देखने को मिलता है।

डॉ. सिंह ने कहा, “जब देश डिजिटल भारत, वित्तीय समावेशन और समान अवसर की बात करता है, तब किसी दिव्यांग नागरिक को बैंक के दरवाजे, एटीएम, लॉकर या केवाईसी प्रक्रिया में ही रोक दिया जाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों के सम्मान, स्वतंत्रता और समानता के अधिकार का उल्लंघन है। ऐसे बैंकों पर निरीक्षण, जवाबदेही और दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए।

कानून स्पष्ट, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रत्येक दिव्यांग नागरिक को समान अवसर, स्वतंत्रता और भेदभाव रहित सेवाओं का अधिकार प्राप्त है। अधिनियम की धाराएं 3, 40, 44, 45 और 46 सार्वजनिक सेवाओं और भवनों को सुगम बनाने की जिम्मेदारी निर्धारित करती हैं। उल्लंघन की स्थिति में दंड का भी प्रावधान है।

  • धारा 40 सरकार को भौतिक वातावरण, परिवहन, सूचना, संचार तथा जन-सेवाओं के लिए सुगम्यता मानक बनाने का अधिकार देती है।
  • धारा 44 कहती है कि किसी भी भवन या सेवा को निर्धारित सुगम्यता मानकों की अवहेलना कर संचालित नहीं किया जा सकता।
  • धारा 45 और 46 मौजूदा भवनों तथा सेवा प्रदाताओं को निर्धारित समय सीमा में दिव्यांगजनों के लिए सुगम बनाने की जिम्मेदारी तय करती हैं।
  • धारा 89 के अनुसार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर बैंकों को दिव्यांगजनों के लिए समान बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराने के स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। 4 जून 2008, 13 अप्रैल 2009, 5 सितंबर 2012, 21 मई 2014 और 9 नवंबर 2017 को जारी दिशा-निर्देशों में बैंकों को कहा गया था कि दृष्टिबाधित, चलने-फिरने में असमर्थ, श्रवणबाधित तथा अन्य दिव्यांग ग्राहकों को चेकबुक, एटीएम, लॉकर, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, ऋण, क्रेडिट कार्ड और अन्य सभी बैंकिंग सेवाएं बिना भेदभाव उपलब्ध कराई जाएं।

इन निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया था कि बैंक शाखाओं और एटीएम को रैम्प, ब्रेल कीपैड, टॉकिंग एटीएम, व्हीलचेयर-अनुकूल प्रवेश और सहायता प्रणाली से लैस किया जाना चाहिए।

फिर भी वास्तविकता यह है कि अनेक बैंक शाखाएं आज भी उन मानकों से काफी दूर दिखाई देती हैं, जिनका पालन कानूनन अनिवार्य है।

अब बैंक केवल शाखा के बाहर बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकते

वर्ष 2024 में वित्त मंत्रालय द्वारा जारी बैंकिंग क्षेत्र के सुगम्यता मानकों ने इस जिम्मेदारी को और स्पष्ट कर दिया है। इन मानकों में बैंक परिसर, एटीएम, स्व-सेवा मशीनें, मोबाइल ऐप, वेबसाइट, डिजिटल भुगतान प्रणाली, ग्राहक सेवा, केवाईसी प्रक्रिया और शिकायत निवारण व्यवस्था को दिव्यांग-अनुकूल बनाने पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि अब बैंक केवल शाखा के बाहर बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकते, बल्कि उन्हें भवन, सेवा, तकनीक और कर्मचारी-व्यवहार—चारों स्तरों पर वास्तविक सुगम्यता सुनिश्चित करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी दिव्यांग अधिकारों को केवल कल्याणकारी विषय नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा माना है।

  • जीजा घोष बनाम भारत संघ में न्यायालय ने कहा था कि दिव्यांग व्यक्ति की गरिमा, सम्मान और समान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़े अधिकार हैं।
  • विकास कुमार बनाम संघ लोक सेवा आयोग में सुप्रीम कोर्ट ने “उचित सुविधा” को वास्तविक समानता का अनिवार्य हिस्सा माना और स्पष्ट किया कि दिव्यांगता को व्यक्ति की कमी नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था में मौजूद बाधाओं के संदर्भ में समझा जाना चाहिए।
  • राजीव रतूड़ी बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और सेवाओं में सुगम्यता को दिव्यांगजनों के स्वतंत्र आवागमन और सम्मानजनक जीवन से जोड़ा।

डिजिटल पहुंच को जीवन और गरिमा के अधिकार से जोड़ सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई दिशा

हाल ही में डिजिटल सुगम्यता को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण दिशा दिखाई है। डिजिटल केवाईसी, वीडियो केवाईसी, आंख झपकाने की शर्त, चेहरे की पहचान, हस्ताक्षर सत्यापन और स्क्रीन रीडर-अनुकूलता जैसी समस्याओं के कारण दृष्टिबाधित व्यक्तियों तथा चेहरे या आंखों से संबंधित विकृति वाले व्यक्तियों को बैंकिंग और अन्य आवश्यक सेवाओं से वंचित होना पड़ रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए डिजिटल पहुंच को जीवन और गरिमा के अधिकार से जोड़ा और वित्तीय संस्थानों को ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में निर्देश दिए, जिसमें वैकल्पिक सत्यापन, अंगूठा निशान, सहायक तकनीक, ऑफलाइन विकल्प और स्क्रीन रीडर-अनुकूल प्लेटफॉर्म उपलब्ध हों।

क्या भवन संबंधी समस्या अधिकारों से बड़ी है?

डॉ. अरविंदर सिंह का मामला इस समस्या का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। एचडीएफसी बैंक, मधुबन शाखा, उदयपुर को पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स की ओर से औपचारिक पत्र भेजा गया था। पत्र में संस्था के अध्यक्ष डॉ. अरविंदर सिंह, जो उसी शाखा के प्रीमियम ग्राहक हैं और सुगम लॉकर और बाधारहित बैंकिंग सेवा उपलब्ध कराने की मांग की गई थी।

डॉ. सिंह की शारीरिक स्थिति ऐसी है कि वे सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते और चलने के लिए कैलिपर तथा सहायक उपकरणों का उपयोग करते हैं। इसके बावजूद बैंक की लॉकर सुविधा ऐसी जगह स्थित है, जहां पहुंचने के लिए सीढ़ियों का उपयोग अनिवार्य है।

बैंक द्वारा दिए गए जवाब में रैम्प या वैकल्पिक सुगम व्यवस्था उपलब्ध कराने में असमर्थता जताते हुए “भवन संबंधी समस्या” का हवाला दिया गया और डॉ. सिंह को दूसरी शाखा में लॉकर सुविधा लेने की सलाह दी गई।

पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने इसे दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, आरबीआई दिशा-निर्देश और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सुगम्यता सिद्धांतों के विपरीत बताया है। संस्था का कहना है कि किसी दिव्यांग ग्राहक को यह कहना कि वह अपनी सुविधा के लिए दूसरी शाखा चला जाए, समान सेवा नहीं, बल्कि भेदभावपूर्ण व्यवहार है। बैंक को ग्राहक को स्थानांतरित करने के बजाय अपनी शाखा को सुगम बनाना चाहिए।

क्या बैंक के भवन की सीमाएं संवैधानिक अधिकारों से बड़ी हो सकती हैं

डॉ अरविंदर सिंह ने सवाल किया है कि क्या किसी बैंक के भवन की सीमाएं किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों से बड़ी हो सकती हैं?

यदि किसी सामान्य ग्राहक को शाखा के भीतर उपलब्ध प्रत्येक सुविधा तक पहुंच प्राप्त है, तो वही सुविधा दिव्यांग ग्राहक को भी समान गरिमा और सम्मान के साथ मिलनी चाहिए। किसी व्यक्ति को उसकी दिव्यांगता के कारण दूसरी शाखा जाने की सलाह देना समान अवसर नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का संकेत है।

अभी हाल ही भारतीय स्टेट बैंक ने आरटीआई के जवाब में उदयपुर में अपनी शाखाओं तथा एटीएम का सुगम्य होना बताया था, पर वास्तिवकता में बहुत से शाखाएं सिर्फ सीढिया तथा फर्स्ट फ्लोर पर बिना लिफ्ट के भी पायी गयी। Panacea Disability rights activists | dr arvinder singh news

वित्तीय समावेशन का अधूरा सच

भारत में वित्तीय समावेशन को विकास का आधार माना जाता है। जनधन खाते, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, डिजिटल भुगतान, पेंशन, बीमा और ऋण योजनाएं इसी सोच का हिस्सा हैं। लेकिन यदि कोई दिव्यांग व्यक्ति एटीएम तक नहीं पहुंच सकता, लॉकर का उपयोग नहीं कर सकता, डिजिटल केवाईसी प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता या बैंक शाखा में प्रवेश ही नहीं कर सकता, तो वित्तीय समावेशन का दावा अधूरा रह जाता है।

सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि दिव्यांगजनों के अधिकार केवल कल्याणकारी योजनाओं का विषय नहीं हैं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़े मौलिक अधिकार हैं। न्यायालय ने बार-बार कहा है कि वास्तविक समानता तभी संभव है जब व्यवस्था व्यक्ति की आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढाले।

जवाबदेही का समय

समस्या कानूनों की कमी नहीं है। समस्या उनके क्रियान्वयन और निगरानी की कमी है। यदि किसी बैंक शाखा में सुगम्यता मानकों का पालन नहीं हो रहा है, तो उसके लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। नियमित निरीक्षण, सार्वजनिक ऑडिट रिपोर्ट, समयबद्ध सुधार योजना और आवश्यक होने पर आर्थिक दंड जैसे उपाय अब अनिवार्य हो चुके हैं।

हर बैंक को अपनी शाखाओं की सुगम्यता स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। प्रत्येक शाखा में दिव्यांग सहायता अधिकारी नियुक्त किया जाना चाहिए। लॉकर, ग्राहक सेवा डेस्क, एटीएम, पासबुक मशीन और शिकायत निवारण तंत्र तक बाधारहित पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। डिजिटल प्लेटफॉर्म को स्क्रीन रीडर-अनुकूल, सरल और वैकल्पिक प्रमाणीकरण व्यवस्था से युक्त बनाया जाना चाहिए।

पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने बताया कि संस्था अब तक विभिन्न विभागों और बैंकिंग संस्थानों में 150 से अधिक सूचना के अधिकार आवेदन दायर कर चुकी है। इन आवेदनों का उद्देश्य यह जानना है कि बैंकों में रैम्प, सुगम लॉकर, टॉकिंग एटीएम, ब्रेल संकेतक, दिव्यांग-अनुकूल शौचालय, स्क्रीन रीडर-अनुकूल वेबसाइट, मोबाइल ऐप, प्रशिक्षित कर्मचारी और शिकायत निवारण प्रणाली वास्तव में उपलब्ध हैं या केवल कागजों में दिखाई जा रही हैं।

दया नहीं, अधिकार

दिव्यांगजन किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहे। वे केवल वही अधिकार चाहते हैं जो संविधान, कानून और न्यायपालिका उन्हें पहले ही प्रदान कर चुके हैं। बैंकिंग सेवा आज के समय में विलासिता नहीं, बल्कि नागरिक जीवन की मूल आवश्यकता है। पेंशन, वेतन, बचत, निवेश, बीमा और डिजिटल भुगतान तक पहुंच आर्थिक स्वतंत्रता का आधार है।

भारत यदि वास्तव में समावेशी और विकसित राष्ट्र बनने का सपना देखता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि बैंक की सीढ़ियां किसी नागरिक के अधिकारों के रास्ते में बाधा न बनें। जिस दिन बैंक का दरवाजा, एटीएम, लॉकर और डिजिटल मंच हर दिव्यांग नागरिक के लिए समान रूप से खुल जाएगा, उसी दिन वित्तीय समावेशन का सपना वास्तविक अर्थों में पूरा माना जाएगा। | Accessible Banking India | Disability Rights in Banking | RBI Accessibility Guidelines

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