उदयपुर। पर्यावरण संरक्षण में पौधरोपण की मियावाकी तकनीक क्रांतिकारी साबित हो रही है। यही कारण है कि हिंदुस्तान जिंक (hindustan zinc) ने न सिर्फ इस तकनीक को प्रमुखता से अपनाया, बल्कि देबारी, दरीबा और चंदेरिया में 65 विभिन्न प्रजातियों के 32500 पौधे मियावाकी तकनीक से लगा चुका है।
हिंदुस्तान जिंक के अनुसार मियावाकी तकनीक से हो रहे पौधरोपण से बंजर भूमि भी हरी-भरी हो रही है। हिंदुस्तान जिंक ने देबरी, दरीबा और चंदेरिया में अपनी परिचालन इकाइयों में 2 4 हेक्टेयर भूमि को सफलतापूर्वक उत्पादक क्षेत्र में बदल दिया है। कंपनी ने अपनी प्रत्येक इकाई में रसायन मुक्त दृष्टिकोण के माध्यम से 65 विविध प्रजातियों के 32500 पौधे लगा चुकी है।
भारत का जस्ता, सीसा और चांदी का सबसे बड़ा और एकमात्र एकीकृत उत्पादक हिंदुस्तान जिंक ने अपने परिवेश को कैनोपी परतों, पेड़ों की परतों, छोटी झाड़ियों और अन्य वनस्पतियों से समृद्ध किया है। जलवायु संरक्षण के लिए हिंदुस्तान जिंक प्रकृति संबंधित वित्तीय प्रकटीकरण फोरम टीएनएफडी की टास्कफोर्स में शामिल हो गया है। इसके अतिरिक्त कंपनी ने इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के साथ तीन साल के महत्वपूर्ण सहयोग पर हस्ताक्षर किए हैं।


