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सामाजिक कुप्रथा हर साल कई मासूमों को बना रही अनाथ : परिजन होने के बावजूद जीवनभर झेलते हैं अनाथ होने का दंश

नाता प्रथा के कारण हर साल करीब 150 बच्चे निराश्रित गृह पहुंचते हैं।

arln-admin by arln-admin
December 15, 2019
Reading Time: 1 min read
many kids live like orphan due to nata pratha in udaipur rajasthan


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लकी जैन, (ARLive news)। एक मासूम बच्चे के मन और जीवन के लिए सबसे बड़ा आघात उससे माता-पिता का साथ छूटना होता है। हमारा समाज इन बच्चों को अनाथ की संज्ञा देता है। माता-पिता की दुर्घटनावश मृत्यु हो जाती है या उन्होंने मां-बाप देखे ही नहीं होते हैं, तो वे बच्चे इस सच को नियति समझ कर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन हमारे समाज में ऐसे भी कई बच्चे हैं, जो माता-पिता होने के बावजूद अनाथों की तरह निराश्रित गृहों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। मेवाड़ अंचल की सामाजिक कुप्रथा हर साल ऐसे ही करीब 150 बच्चों को अनाथ बना रही है।

उदयपुर जिला बाल कल्याण समिति से प्राप्त जानकारी के अनुसार सामाजिक कुरीति नाता प्रथा और आदिवासी समाज में जीवनसाथी बदलने का चलन हर साल उदयपुर जिले में ही 90 से 140 बच्चों को अनाथों की तरह जीवन जीने पर मजबूर कर रहा है। उदयपुर के राजकीय किशोर गृह, जीवन ज्योति, आसरा विकास संस्थान सहित अन्य निराश्रित गृहों में रह रहे कुल निराश्रित बच्चों मे से 50 प्रतिशत से अधिक प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिनकी मां किसी के साथ नाते चली गयी या पिता भी दूसरी शादी कर कहीं चला गया और बच्चा माता-पिता के जीवित रहते हुए भी अनाथ हो गया। ऐसे केस भी हैं जिनमें माता-पिता में से एक की मृत्यु हो गयी और मासूम को अकेला छोड़कर मां नाते चली गयी या पिता ने दूसरी शादी कर घर छोड़ दिया।

इन परिस्थितियों के बीच एक मासूम माता-पिता के होते हुए भी अनाथ हो जाता है और जीवन भर इस दंश को झेलता है। एआर लाइव न्यूज ने जब इन बच्चों की मानसिक स्थिति को लेकर विशेषज्ञों, बालकल्याण समिति सदस्य, राजकीय किशोर गृह अधीक्षक से बात की तो समाज के इस सामाजिक कुप्रथा से मासूम मन को होने वाली पीड़ा और दर्द का खुलासा हुआ।

बच्चे के मन में टीस रहती है और इसका परिणाम युवावस्था तक भी रहता है

राजकीय किशोर गृह के अधीक्षक के.के. चन्द्रवंशी ने बताया कि मां के नाते चले जाना या पिता का बच्चों को छोड़ दूसरी शादी कर लेना, इन परिस्थितियों का सामना करने वाले बच्चों की मानसिक स्थिति उन बच्चों की मानसिक स्थिति से भी ज्यादा खराब होती है जिनके माता-पिता नहीं होते या नवजात कहीं सड़क किनारे मिलता है। ये डिस्प्यूटेड फैमिली होती हैं और इसके बहुत सारे साईडिफैक्ट बच्चे की मानसिक स्थिति पर होते हैं। ये बच्चे बोलते नहीं है, पर इनमें टीस हमेशा रहती है।

वर्ल्ड लेवल पर हुई एक स्टडी में यूएस में पाया गया था कि जिन बच्चों से स्कूल में गन मिलने के मामले हुए, उनमें 80 प्रतिशत मामलों में बच्चे डिस्प्यूटेड फैमिली से पाए गए थे। डिस्प्यूटेड फैमिली के बच्चों में भटकने की संभावनाएं ज्यादा होती है।

मानसिक या भावनात्मक रूप से कमजोर होने की संभावना ज्यादा होती है

आसरा विकास संस्थान के संस्थापक भोजराज सिंह ने बताया कि जिनके माता-पिता नहीं होते, उनकी तुलना में ये बच्चे बहुत अलग होते हैं। माता-पिता के होते हुए भी उनसे अलग होने का दर्द इनके मन में हमेशा रहता है और इसके परिणाम युवावस्था तक रहते हैं। अक्सर देखा गया है कि प्रोपर केयर नहीं मिलने पर ये बच्चे समाज की मुख्यधारा से पिछड़ जाते हैं, चाहे शैक्षणिक स्तर हो, मानसिक या भावनात्मक रूप, इनका विकास बाधित होने की आशंका रहती ही है।

किशोर गृह ऐसे हों जहां बच्चे को अपनापन और प्यार मिले 

के.के. चन्द्रवंशी ने बताया कि इन बच्चों की काउंसलिंग प्रोपर होनी चाहिए। इनके साथ सामान्य अनाथ बच्चों जैसा व्यवहार नहीं कर सकते, इन्हें ज्यादा प्यार और केयर की जरूरत होती है। परिवार में उसे जितना प्यार मिला होता है, निराश्रित गृह में उससे ज्यादा प्यार और केयर मिलती है तब बच्चा उस नए माहौल और घर को अपना पाता है।

निराश्रित गृह में इन्हें यह भरोसा दिलाते हैं कि यह तुम्हारा घर है

जिला बाल कल्याण समिति के सदस्य हरीश पालीवाल ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में पति-पत्नी के बीच छोटी-छोटी बात पर झगड़े हो जाते हैं, मां कहीं चली गयी या पिता चले गए जैसे मामले होते हैं। ऐसे बच्चों की मानसिक स्थिति सामान्य निराश्रित बच्चों से ज्यादा खराब होती है। इनकी कोई केयर नहीं होती। कोई तरस खाकर खाना देदे तो ठीक, इन परिस्थितियों और मानसिक स्थिति में जब ये बच्चे निराश्रित गृह पहुंचते हैं तो शुरूआती दिनों में कंफर्ट नहीं हो पाते हैं।

निराश्रित गृह में काउंसलिंग के बाद इंचार्ज, स्टाफ सहित हर स्तर पर इनको भरोसा दिलाया जाता है कि अब यह तुम्हारा घर है और यहां से तुम्हें कोई नहीं निकालेगा।

सीडब्ल्यूसी पालीवाल सदस्य ने बताया गत वर्ष ही डबोक से दो बच्चे आए थे, इनकी मां नाते चली गयी थी, पिता की मौत हो गयी तो ये बच्चों का कोई नहीं रहा। दो-तीन दिनों तक चौराहे पर भूखे, दयनीय हालत में बैठे रहे, फिर पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना कर हम तक पहुंचाया। इन बच्चों को निराश्रित गृह भेजा, जहां काफी काउंसलिंग हुई, इन बच्चों को निराश्रित गृह को अपनाने में समय लगा।

कानूनी तौर पर प्रावधान हो

विशेषज्ञों का कहना है कि जब किसी नवजात को लावारिस सड़क पर छोड़ने पर पुलिस अक्सर अज्ञात माता-पिता के खिलाफ मामला दर्ज करती है, मामला बालक को असुरक्षित लावारिस छोड़ने, जीवन खतरे में डालने के के आरोप में दर्ज होता है, तो बच्चे को इस प्रकार से छोड़ने के मामलों में भी माता-पिता के खिलाफ कानूनी कार्यवाही का प्रावधान होनी चाहिए। किसी भी कुप्रथा को खत्म करने के लिए जागरूकता के साथ ही कानूनी प्रावधान भी जरूरी होते हैं।

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