सभी आरोपी बरी हो चुके है : अपील में नहीं जाना सीबीआई की पुरानी आदत।

सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस के गवाह आजम ने हरेन पंड्या हत्याकांड में जिन आईपीएस अधिकारी डीजी बंजारा के सुपारी देने का खुलासा किया है, ताजुब्ब की बात है कि इस हत्याकांड का सबसे पहला अनुसंधान भी इनके सुपरविजन में ही हुआ था, या यह कह सकते हैं कि अनुसंधान बंजारा ने ही किया था, तब बंजारा अहमदाबाद क्राइम ब्रांच में डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस थे। केस में बंजारा की टीम हैदराबाद से असगर अली नाम के एक बदमाश तक पहुंची भी थी। बाद में जब फाइल सीबीआई को ट्रांसफर हुई, तब सीबीआई ने पूर्व में क्राइम ब्रांच पुलिस द्वारा किये अनुसंधान को ही आधार मानते हुए अनुसंधान आगे बढ़ाया था। सीबीआई ने मुख्य आरोपी असगर अली सहित 12 आरोपियों को गिरफ्तार किया था और इनके खिलाफ सेषन कोर्ट में चालान पेश किया था।
“ जिस जांच को सीबीआई ने आधार बनाया वह अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस डीजी बंजारा के सुपरविजन में हुई थी, तो इस अनुसंधान की निष्पक्षता पर अपने आप सवालिया निशान लग जाता है। यह सवालिया निशान तब और गहरा हो गया, जब सभी 12 आरोपी हत्याकांड से बरी हो गए, जिनके खिलाफ सीबीआई ने चालान पेश किया था। ”
गौरतलब है कि 26 मार्च 2003 को हुए हरेन पंड्या हत्याकांड के सभी आरोपी दोष साबित नहीं होने पर हाईकोर्ट से बरी हो चुके हैं। गुजरात के पूर्व गृहमंत्री होने के बावजूद हरेन पंड्या हत्याकांड आज भी एक रहस्य बना हुआ है कि आखिरकार हरेन पंड्या की हत्या किसने करवाई थी, क्यों करवाई थी और हत्या की किसने थी।
हरेन पंड्या हत्याकांड और सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर : दोनों केस के वे खास पहलू जो सीबीआई को लाती है सवालों के घेरे में :
दोनों ही केस में सीबीआई ने नहीं की अपील
सीबीआई ने हरेन पंड्या हत्याकांड में जिन 12 लोगों को आरोपी बनाया था, हाईकोर्ट ने इनको हत्या करने का दोष साबित नहीं होने पर बरी कर दिया था, लेकिन सीबीआई ने इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील तक नहीं की। सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, सीबीआई ने अनुसंधान कर जिन राजनेताओं, आईपीएस अधिकारियों और रसूकदार व्यापारियों को आरोपी बनाया था और चार्जशीट पेश की थी, जब सेशन कोर्ट ने इन्हें बरी कर दिया तो सीबीआई ने इस आदेश को हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती तक नहीं दी। जबकि बरी हुए इन अधिकारियों की केस में 7-7 वर्षों तक जमानत तक नहीं हुई थी और ये इतने वर्ष जेल में रहे थे। सीबीआई की ही मजबूत दलीलों के चलते इनकी जमानतें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से खारिज हुई थी। सवाल यह है कि आखिरकार सीबीआई इन फैसलों के खिलाफ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील क्यों नहीं करती है।
दोनों ही केस में प्रारंभिक तफ्तीश को बनाया आधार
हरेन पंड्या हत्याकांड का सबसे पहले अनुसंधान अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के तत्कालीन पुलिस डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस डीजी बंजारा के सुपरविजन में हुआ था। सीबीआई ने जब अनुसंधान शुरू किया तो प्रारंभिक जांच को ही आधार बनाते हुए तफ्तीश आगे बढाई थी। अब बंजारा पर ही हत्या करवाने का आरोप लगा है। सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस की प्रारंभिक जांच गुजरात सीआईडी की आईजी गीता जौहरी के सुपरविजन में हुई थी। इसी प्रारंभिक जांच को ही आधार बनाते हुए सीआईडी गुजरात ने सोहराबुद्दीन व तुलसी प्रजापति एनकाउंटर केस में चार्जशीट पेश की थी, बाद में सीबीआई ने भी इसी कहानी को आधार बनाकर अग्रिम अनुसंधान कर चार्जशीट की थी। बाद में सीबीआई ने गीता जौहरी को भी मामले में आरोपी बनाया था।
दोनों ही केस में बरी हो चुके हैं मुख्य आरोपी-षडयंत्रकारी
हरेन पंड्या हत्याकांड में सीबीआई ने जिन आरोपियों को गिरफ्तार कर इनके खिलाफ चालान पेश किया था और इन्हें मुख्य षडयंत्रकारी व हत्यारा बताया था, वे सभी दोष साबित नहीं होने से हाईकोर्ट से बरी हो चुके हैं। सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस में भी सीबीआई ने अनुसंधान कर जिन राजनेता, व्यवसायी और आईपीएस अधिकारियों को मुख्य षडयंत्रकारी और आरोपी बताकर गिरफ्तार किया था और इसे फर्जी एनकाउंटर बताया था, वे सभी राजनेता, व्यवसायी और आईपीएस अधिकारी बरी हो चुके है।
2003-04 में असगर अली के लिखे पत्र में हुआ था उसके सच का खुलासा
”” हरेन पंड्या हत्याकांड में गिरफ्तार होने के बाद अहमदाबाद जेल में रहते हुए असगर अली ने जेल अधीक्षक संजीव भट्ट के जरिए जेल प्रक्रिया के तहत एक पत्र गृह विभाग, गृह मंत्रालय, राष्ट्रपति सहित अन्य को भेजा था। इसमें असगर अली ने लिखा था कि यह सही है कि सोहराबुद्दीन ने नयीमुद्दीन उर्फ कलीमुद्दीन के जरिए संपर्क कर उसे हरेन पंड्या की हत्या की सुपारी दी थी और कहा था कि 2002 में हुए दंगों से हरेन पंड्या संबंधित है, इसलिए इसे मारना है। इस पर असगर अली अपनी पूरे गिरोह के साथ रैकी करने अहमदाबाद आया भी था। रैकी के दौरान असगर अली को पता चला था कि हरेन पंड्या ने दंगों में लोगों की मदद की थी, तो उसने हरेन पंड्या को मारने का विचार छोड़ दिया और इस काम के लिए सोहराबुद्दीन को मना कर गिरोह के साथ हैदराबाद लौट गया था। असगर अली ने पत्र में यह भी कबूल किया था कि उसे कुछ दिनों बाद हरेन पंड्या की हत्या और इसमें सोहराबुद्दीन व उसके साथियों के मिले होने का पता चला था। लेकिन सीबीआई ने असगर अली के इस पत्र पर न तो ध्यान दिया था और न ही तफ्तीष की थी। हालां कि बाद में जेल अधीक्षक संजीव भट्ट को वहां से हटा दिया गया था, जिन्होंने इस पत्र को सभी जगह जेल प्रक्रिया के तहत फॉरवर्ड किया था। ””


