सीबीआई धारा 293 के तहत कोर्ट में वे दस्तावेज भी एग्जीबिट करवाना चाहती थी, जो इसके तहत नहीं आते हैं।

सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस में सोमवार को मुुंबई की सीबीआई स्पेशल कोर्ट में गहमा-गहमी का माहौल रहा। कोर्ट को बचाव पक्ष के वकीलों से जब यह पता चला कि सीबीआई कोर्ट का समय बचाने के नाम पर उन दस्तावेज को भी एग्जीबिट करवाना चाहती है, जो सीआरपीसी की धारा 293 के तहत नहीं आते हैं, इस पर कोर्ट को गुमराह करने के प्रयास में कोर्ट ने सीबीआई की लताड़ लगाई और मंगलवार को कोर्ट में सीबीआई के एसपी को तलब किया है।
हुआ यूं कि गत दिनों 24 जुलाई को सीबीआई के स्पेशल पीपी बीपी राजू ने कोर्ट में एक एप्लीकेशन लगाई थी। जिसमें कोर्ट से निवेदन किया था कि सीआरपीसी की धारा 293 के तहत एफएसएल, सीएफएसएल और क्यूयूईडी की रिपोर्ट्स व दस्तावेज संबंधित गवाहों के बयान कराए बगैर ही कोर्ट में एग्जीबिट कर लिए जाएं। इस याचिका के साथ ही सीबीआई ने सोहराबुद्दीन से संबंधित 18 दस्तावेज और तुलसी से संबंधित 14 दस्तावेजों की सूची भी पेष की थी। सीबीआई ने एप्लीकेशन में लिखा था कि इन दस्तावेजों के गवाह के बयान हुए बगैर एग्जीबिट होने से कोर्ट का समय बचेगा। इस एप्लीकेशन पर कोर्ट ने बचाव पक्ष के वकीलों से सोमवार को जवाब मांगा था।
सीबीआई की खुली पोल
बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि सीबीआई ने दस्तावेजों की जो सूची पेश की है, उन दस्तावेजों की प्रतियां सीबीआई द्वारा आरोपियों को आज तक नहीं दी गई हैं। ऐसे में बिना दस्तावेज देखे स्वीकार करना न्यायोचित नहीं होगा।
इसके बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट को जो जानकारी दी, उससे सीबीआई की मंशा साफ हो गई। बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि सीबीआई ने सूची में ऐसे दस्तावेजों को भी शामिल किया है, जो सीआरपीसी की धारा 293 के तहत नहीं आते हैं। सीबीआई ने मुख्य रूप से सूची में केस से संबंधित मोबाइल काॅल डिटेल, इनकी सीडीआर, सीडीआर फीड की गई सीडीज, फोटोग्राफ की सीडी, केस में कराई गई वीडियोग्राफी की सीडी, डाॅक्टर्स की ओपीनियन और सीबीआई द्वारा संबंधित एजेंसियों की ली गई ओपीनियन व पत्राचार संबंधित दस्तावेजों को शामिल किया था। बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि ये दस्तावेज धारा 293 के तहत नहीं आते हैं।
इसके अलावा बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी आकर्षित करवाया कि सीबीआई पूर्व में कई एफएसएल एक्सपर्ट के बयान कोर्ट में करा चुकी है। ऐसे में सीएफएसएल रिपोर्ट, जो एफएसएल रिपोर्ट से विरोधाभासी भी हैं, कोर्ट में एडमिट करवाना न्यायोचित नहीं होगा।
इन सभी बिंदुओं के खुलासे के बाद न्यायाधीश ने कोर्ट का समय बचाने के नाम पर कोर्ट को गुमराह करने के लिए सीबीआई की लताड़ लगाई। कोर्ट ने सीबीआई के एसपी को मंगलवार सुबह कोर्ट में तलब किया है।
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एक साथ गश्त कर रहे एसआई और कांस्टेबल के बयानों में आया विरोधाभास
सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस में सोमवार को सीबीआई स्पेशल कोर्ट में तुलसी एनकाउंटर के समय अंबाजी थाने के कांस्टेबल ड्राइवर सामंत सिंह और एसआई रणछोड़ भाई के बयान हुए। 27-28 दिसंबर 2006 की जिस रात तुलसी एनकाउंटर हुआ, उस रात ये दोनों और एक अन्य कांस्टेबल हितेश परमार रात्री गश्त पर थे। लेकिन इन दोनों के बयानों में विरोधाभास रहा।
कोर्ट में कांस्टेबल सामंत सिंह ने बताया कि 27-28 दिसंबर 2006 की मध्यरात्री उसकी रात्री गश्त थी, वह पुलिस जीप का चालक था और साथ में एसआई रणछोड़ और कांस्टेबल हितेश साथ थे। कांस्टेबल ने बताया कि जिस रात वह क्षेत्र में गश्त कर रहा था, उसने अंबाजी कस्बे में एक पुलिस जीप निकलते हुए देखी थी। रातभर गश्त में उसने कहीं भी किसी अन्य पुलिस की पेट्रोलिंग या नाकेबंदी नहीं देखी थी और ना ही उसे इसकी कोई सूचना थी।
वहीं इसके विपरीत एसआई रणछोड़ भाई नई ने कोर्ट को बताया कि वे रात्री गश्त में थे, जीप चालक सामंत सिंह थे और साथ में एक कांस्टेबल हितेश भी था। उन्होंने रातभर क्षेत्र में गश्त की। रात को उन्होंने किसी अन्य पुलिस जीप को निकलते हुए नहीं देखा था, न ही क्षेत्र में नाकाबंदी देखी थी। सुबह पांच बजे खैरियत रिपोर्ट देकर वे घर लौट गए, तभी थाने से फोन आया और इंस्पेक्टर ने सिटी हाॅस्पिटल जाने को कहा। वहां पहुंचा तो पीआई पटेल ने बताया कि अनुसंधान में मदद चाहिए होगी, एक एनकाउंटर हुआ है। उनसे बातचीत में ही पता चला कि एनकाउंटर तुलसी राम का हुआ था।
इन दोनों के बयान के बाद सीबीआई ने तीसरे गवाह के बयान ड्राप करवा दिये। इससे तीसरे गवाह हितेश के बयान नहीं हुए।


