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उदयपुर सिंडीकेट बैंक में हुए 1267 करोड़ के घोटाले के सूत्रधार सीए भरत बंब सहित आरोपियों की 91.80 करोड़ की सम्पत्ति ईडी ने अटैच की

arln-admin by arln-admin
September 16, 2020
Reading Time: 1 min read
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उदयपुर,(ARLive news)। उदयपुर में पांच साल पहले सिंडीकेट बैंक में हुए 1267 करोड़ के घोटाले में प्रर्वतन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी कार्यवाही करते हुए मुख्य आरोपी भरत बंब सहित अन्य आरोपियों की 91.80 करोड़ की संपत्ति अटैच की है। ईडी ने यह कार्यवाही मनी लॉन्ड्रिग एक्ट के तहत की है।

इसमें से करीब 10 करोड़ की सम्पत्ति तो सिर्फ उदयपुर और जयपुर में ही कुर्क की गयी है। इसमें उदयपुर की कई प्राइम प्रोपर्टी, शोभागपुरा चौराहा स्थित रॉयल राज विलास में बने कुछ ऑफिस सहित प्लॉट, दुकानें, ऑफिस, एग्रीकल्चर भूमि और बंगले शामिल हैं। इस घोटाले में अब तक 478.38 करोड़ की संपत्ति मनी लॉड्रिंग एक्ट के तहत अटैच की गयी है।

सीए भरत बंब, कारोबारी शंकर खंडेलवाल के अलावा बंब की पत्नी पूजा बंब, पिता शांतिलाल बंब, साथी, प्रदीप निमावत, महेन्द्र मेघवाल, विनीत जैन, हिमांषु वर्मा, जयपुर के वर्ल्ड ट्रेड पार्क डब्ल्यूटीपी के मैनेजिंग डायरेक्टर अनूप बरतरिया सहित बैंक के अफसर भी ईडी की जांच के दायरे में हैं। ईडी की आगे की कार्यवाही जारी है।

फर्जी फर्में बनायी, फर्जी तरीके से बैंक खाते खुलवाकर बड़े-बड़े लोन उठाए

उदयपुर के भूपालपुरा निवासी सीए भरत बंब, जयपुर निवासी शंकर खंडेलवाल ने सिंडीकेट बैंक के 3 शाखाओं के मैनेजर और अन्य अधिकारी, कर्मचारियों से मिलीभगत कर 2011 से 2016 के बीच 1267 करोड़ का घोटाला किया था।

चार्टर्ड अकांटेंट भरत बंब उसके उन क्लाइंट्स के दस्तावेज उपयोग में लेता था, जो अपने वित्त संबंधी लेखा-जोखा कार्य सीए भरत बंब से करवाते थे, जिसके चलते कंपनी की सम्पत्तियों के महत्वपूर्ण दस्तावेज सीए भरत बंब के पास होते थे।

इस तरह भरत बंब ने बैंक मैनेजरों की मदद से क्लाइंट्स, परिचित के नाम से फर्जी फर्में बनाकर बैंक में करीब 386 फर्जी खाते खुलवाए। फर्जी दस्तावेजों की मदद से लोन व पॉलिसियों लीं व इन खातों में जब लोन या पॉलिसी राशि आयी तो वो खाते से क्रेडिट कर लिए। फर्जी तरीके से चेक भी ईशू हुए, जिससे रूपयों का ट्रांजेक्शन एक खाते से दूसरे खातों में होता रहा। इतने सालों इन आरोपियों ने मिलीभगत कर अपने ही ऑडिटर्स लगाए और गलत ऑडिट भी करवाते रहे। इस तरह 5 साल तक यह घोटाला चलता रहा। 2015-16 में जब मुख्यालय से गए एक ऑडिटर ने यह गड़बड़ी पकड़ी तो फिर पूरे घोटाले का खुलासा हुआ।

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