वॉशिंगटन/नई दिल्ली,(ARLive news)। अमेरिका की मशहूर मैगजीन टाइम ने अपने ताजा अंक में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कवर स्टोरी की है, लेकिन एक विवादास्पद सवाल के साथ। ये सवाल ऐसे समय आया है जब भारत में लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर सभी राजनैतिक पार्टिया एक्शन मोड़ में है और मोदी के खिलाफ विपक्ष पूरी तरह से आक्रामक है, वैसे में प्रधानमंत्री मोदी को लेकर छपे इस सवाल से काफी सारे सवाल उठ रहे है।
पत्रिका ने पूछा है – क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र मोदी सरकार को आने वाले और पांच साल सहन कर सकता है?” पत्रिका ने अपने कवर पेज पर ‘इंडियाज डिवाइडर इन चीफ’ (India’s Divider In Chief) शीर्षक से मोदी की एक इलस्ट्रेटेड तस्वीर लगाई है। शीर्षक का अर्थ है- ‘भारत को प्रमुख रूप से बांटने वाला।
टाइम मैगजीन के एशिया संस्करण ने लोकसभा चुनाव 2019 और पिछले पांच सालों के दौरान मोदी सरकार के कामकाज पर विस्तृत खबर प्रकाशित की है। यह पत्रिका अभी बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं है। मोदी पर कवर स्टोरी वाला यह अंक 20 मई 2019 को जारी होगा। लोकसभा चुनाव 2019 के आख़िरी चरण का मतदान 19 मई को है और चुनाव के नतीजे 23 मई को आएंगे। इससे पहले टाइम ने अपनी वेबसाइट पर इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है।
पहले भी मोदी टाइम के कवर पेज पर रहे चुके हैं
नरेंद्र मोदी पर केंद्रित इस कवर स्टोरी को पत्रकार आतिश तासीर ने लिखा है। इससे पहले टाइम पत्रिका ने साल 2012 फिर साल 2015 में मोदी को अपने कवर पेज पर जगह दी थी। वहीं साल 2014, 2015 और 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया था। मई 2015 में पत्रिका ने मोदी पर कवर स्टोरी की थी और उसे नाम दिया था- ‘व्हाय मोदी मैटर्स’ (Why Modi Matters)। टाइम पत्रिका ने प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना के साथ-साथ उनके काम की तारीफ भी की है। पत्रिका के इस आलेख में नेहरू के समाजवाद और भारत की मौजूदा सामाजिक परिस्थिति की तुलना करते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर टिप्पणी की है।
आलेख में कहा गया है कि मो मोदी दी ने भारत के महान शख्सियतों पर राजनीतिक हमले किए जैसे कि नेहरू। वह कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हैं, उन्होंने कभी भी हिंदू-मुसलमानों के बीच भाईचारे की भावना को मजबूत करने के लिए कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। इस लेख में आगे लिखा है कि नरेंद्र मोदी का सत्ता में आना इस बात को दिखाता है कि भारत में जिस कथित उदार संस्कृति की चर्चा की जाती थी वहां पर दरअसल धार्मिक राष्ट्रवाद, मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं और जातिगत कट्टरता पनप रही थी।
टाइम के आलेख में कहा गया है कि नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में लोगों के गुस्से के देखते हुए आर्थिक वादे किए। उन्होंने नौकरी और विकास की बात की। लेकिन अब ये विश्वास करना मुश्किल लगता है कि वह उम्मीदों का चुनाव था। आलेख में कहा गया है कि मोदी द्वारा आर्थिक चमत्कार लाने के वादे फेल हो गए। यही नहीं उन्होंने देश में जहर भरा धार्मिक राष्ट्रवाद का माहौल तैयार करने में जरूर मदद की।
नरेंद्र मोदी 2002 के दंगों के दौरान अपनी चुप्पी से ‘उन्मादी भीड़ के दोस्त’ साबित हुए
नेहरू की विचारधारा सेक्युलर थी जहां सभी धर्मों को समान रूप से इज्जत थी। भारतीय मुसलमानों को शरिया पर आधारित फैमिली लॉ मानने का अधिकार दिया गया, जिसमें तलाक देने का उनका तरीका तीन बार तलाक बोलकर तलाक लेना भी शामिल था। जिसे नरेंद्र मोदी ने 2018 में एक आदेश जारी कर तीन तलाक को कानूनी अपराध करार दे दिया। आलेख में 1984 के सिख दंगों और 2002 के गुजरात दंगों का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व भी 1984 के दंगों को लेकर आरोप मुक्त नहीं है लेकिन फिर भी इसने दंगों के दौरान उन्मादी भीड़ को खुद से अलग रखा। लेकिन नरेंद्र 2002 के दंगों के दौरान अपनी चुप्पी से ‘उन्मादी भीड़ के दोस्त’ साबित हुए।


