
इंस्पेक्टर अब्दुल रहमान ने कोर्ट में बयान दिए कि सीआईडी और सीबीआई किसी भी जांच एजेंसी ने दोनो केस में फेयर और निष्पक्ष जांच नहीं की और जानबूझ कर मुझे इस केस में फंसाया है। मैं पूरी तरह निर्दोष हूं। किसी ने मेरे नाम का दुरुपयोग कर थाने में सोहराबुद्दीन केस की एफआईआर दी थी। मैं न तो एनकाउंटर में शामिल था और न ही मैंने कोई एफआईआर कभी दी। इस केस में जब्त हथियार से मैंने कभी फायरिंग नहीं की थी। सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर और कौसरबी के गायब होने से मेरा कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि तुलसी एनकाउंटर केस में भी जांच एजेंसी सीबीआई ने मुझे झूठा फंसाया था। तुलसी केस में सीआईडी ने 3 चार्जशीट पेश की थी, तीनों ही चार्जशीट में मेरा कहीं नाम नहीं था और सीआईडी ने कभी इस केस में मुझे आरोपी नहीं बनाया था, लेकिन जांच जब सीबीआई को सौंपी गई तो सीबीआई ने इस केस में मुझे झूठा फंसाने के लिए गलत साक्ष्य और गवाह तैयार किए।
अब्दुल रहमान ने आगे कोर्ट को बताया कि दोनों केस में मुझे फंसाने के लिए सीबीआई ने हामिदलाल के भाई मजीद मोहम्मद, पड़ोसी आरिफ, आरिफ की पत्नी शबाना, तुलसी के साथी फिरोज और रफीक उर्फ बंटी के झूठे बयान लिखे, साथ ही पुलिस अधिकारी रणविजय सिंह, भंवर सिंह हाड़ा, हिम्मत सिंह और सुधीर जोशी को भी डरा धमका, टॉरचर कर मेरे खिलाफ झूठे बयान दिलवाए। सीबीआई ने तुलसी के साथी शराफत उर्फ कालू पर भी दबाव डाला और उसके भी झूठे बयान करवाए थे। इस प्रकार सीबीआई ने मुझे इस केस में फंसाने के लिए गलत साक्ष्य और गवाह तैयार किए और उनके झूठे बयान कोर्ट में तक करवाए।
कोर्ट के सवाल पूछने पर उन्होंने बताया कि तुलसी को दो बार पेशी पर अहमदाबाद लेकर गए थे, उस पूरी एस्कॉर्ट पार्टी में मैं भी एक सदस्य था। पेशी के बाद एस्कॉर्ट पार्टी ने तुलसी को वापस उदयपुर सेंट्रल जेल जमा करवा दिया था। एस्कॉर्ट पार्टी में जाना रूटीन प्रक्रिया थी, तुलसी को पेशी पर ले जाने के अलावा मेरा कोई रोल नहीं था। जनवरी 2005 में हामिदलाल हत्याकांड के बाद पुलिस की एस्कॉर्ट पार्टी के साथ मैं उज्जैन गया था और तुलसी का क्रिमिनल रिकॉर्ड लिया था।
अब्दुल रहमान ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने सीआईडी और सीबीआई को सभी तथ्य बताए थे, लेकिन जांच एजेंसियों ने सही जांच नहीं कर अपना मोटिव पूरा करने के लिए मुझे इस केस में फंसाया है। जबकि इस केस और इसके षडयंत्र से मेरा कोई संबंध नहीं है। इस केस से मुझे न तो कोई पॉलिटीकल फायदा था, न ही आर्थिक फायदा था। एसपी दिनेश एमएन तो ईमानदार अधिकारी हैं।
मोबाइल इंटरसेप्शन गृह विभाग की अनुमति से होते हैं, मैंने कैसे करवाया ?
सीबीआई ने मेरे खिलाफ इंस्पेक्टर हिम्मत सिंह से झूठे बयान दिलवाए कि मैं इंस्पेक्टर हिम्मत सिंह के साथ सेंट्रल जेल गया था, वहां तुलसी के पास एक मोबाइल प्लांट करवाया था, इस मोबाइल को इंटरसेप्शन पर लिया था और इसका इंटरसेप्शन हिम्मत सिंह के मोबाइल पर दिया था। यह सभी आरोप पूरी तरह झूठे हैं, क्यों कि किसी भी मोबाइल को इंटरसेप्शन पर लेने का कार्य आईजी ही करवा सकते हैं और वे भी इसकी अनुमति गृह विभाग से लेने के बाद ऐसा करते हैं। मैं बतौर एक इंस्पेक्टर इंटरसेप्शन कैसे करवा सकता था।


