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मध्यप्रदेश और राजस्थान में दरिदों की हवस का शिकार हो मौत के घाट उतारी गईं मासूम बच्चियों को सर्वोच्च न्यायालय से इंसाफ का इंतजार :

arln-admin by arln-admin
June 3, 2018
Reading Time: 1 min read
मध्यप्रदेश और राजस्थान में दरिदों की हवस का शिकार हो मौत के घाट उतारी गईं मासूम बच्चियों को सर्वोच्च न्यायालय से इंसाफ का इंतजार :


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स्पेशल स्टोरी उन बच्चियों को समर्पित, जो दरिंदों की हवस का शिकार हुई और अब इंसाफ के लिए इंतजार उनका नसीब है 

बेटियों की गुहार उनके गुनाहगार दरिंदे के लिए मौत से कम कुछ नहीं : 
उदयपुर। देश के मध्यप्रदेश और राजस्थान की दो बेटियां इन दिनों अपनी कोमल-मासूम आत्मा और शरीर को मिले कई घाव और मौत का इंसाफ देश की सर्वोच्च न्यायालय से मांग रही हैं। दुष्कर्मियों ने इन नन्हीं बेटियों को न सिर्फ अपनी हवस का शिकार बनाया था, बल्कि गुनाहों को छुपाने के लिए बेहद निर्मम हत्या कर दी थी।

चार दिन पहले ही 30 मई को देश के सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश में हुए 11 वर्षीय बच्ची के अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और निमर्म हत्या के दो आरोपियों बाघवानी और सतीश को हाईकोर्ट से मिली फांसी की सजा पर रोक लगाई है। यह बेटी और इसके परिजन अपने गुनाहगारों को मौत की सजा दिलाने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगा रहे हैं। इस मामले में 9 मई को हाईकोर्ट ने कहा अपराधी को मौत से कम कुछ सजा नहीं दी जा सकती है। 9 मई को ही इन दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी।

हाईकोर्ट ने कहा बच्ची आत्मा और शरीर को मिले घाव के असहनीय और अनजान पीडा से गुजरीं, बच्ची की निर्मम हत्या की गई, ऐसे को मौत से कम कोई सजा नहीं दी जा सकती। 
मध्यप्रदेश में 15 अप्रेल 2017 को परिवार के साथ गांव के कार्यक्रम में गई 11 वर्षीय बच्ची का गांव के ही परिचित बाघवानी और सतीश अपहरण कर ले गए थे। दोनों दरिंदों ने बच्ची को बारी-बारी से हवस का शिकार बनाया और फिर गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी। बच्ची का अर्ध नग्न शव सडक के नजदीक फेंक दिया था। इसके बाद दोनों दरिदें बिना किसी डर और ग्लानि के शहर में घूमते-फिरते रहे और शराब भी खरीदी थी। पुलिस ने बाघवानी और सतीश दोनों को गिरफतार किया था। एमपी के जिला एवं सत्र न्यायालय आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई थी। वाघवानी ने फांसी के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई कर टिप्पणी की थी कि एक 11 वर्षीय बच्ची को हवसक का शिकार बना, उसकी निर्मम हत्या करने वाले अभियुक्तों को मौत से कम कुछ सजा नहीं दी जा सकती है। हाईकोर्ट ने गत महीने 9 मई को ही इन दोनों को फांसी की सजा सुनाई थी। इस आदेश को बाघवानी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। जहां याचिका को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चार दिन पहले 30 मई को दोनों आरोपियों की फांसी की सजा पर स्टे लगा दिया है।
दुष्कर्म के बाद पत्थर से सिर कुचलकर की थी चार वर्षीय मासूम की हत्या
राजस्थान के राजसमंद जिले में 28 अक्टूबर 2013 को वहशी दरिंदा मनोज प्रताप सिंह गांव की चार वर्षीय मासूम बच्ची का अपहरण कर सुनसान क्षेत्र ले गया था, उसने बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया और फिर सबूत मिटाने के लिए पत्थर से सिर कुचलकर उसकी हत्या कर दी थी। इस मामले में राजसमंद जिला एवं सत्र न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि इस अभियुक्त को फांसी से कम कोई सजा नहीं दी जा सकती है, ओर उसे फांसी की सजा सुनाई थी। अभियुक्त ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने भी अभियुक्त की फांसी की सजा को बरकरार रखा। अभियुक्त ने सुप्रीम कोर्ट में मामले को चुनौती दी थी और तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित चल रहा है।
पांच वर्ष बाद भी इंसाफ नहीं, ऐसे केस के निस्तारण की समय सीमा होनी चाहिए
आमजन का कहना है कि केन्द्र सरकार ने 12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची से दुष्कर्म के अपराध में फांसी की सजा का प्रावधान किया है। लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में सालों तक अपराधी को फांसी नहीं हो रही है। अपराधी को सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट से सजा हो जाए तो सुप्रीम कोर्ट में मामले लंबित रहते है। अपराधी तो जेल में बचने के रास्ते तलाशता रहता है और मासूम बच्ची के परिजन इंसाफ की गुहार लगाते अदालतों के चक्कर काटते रहते है। बच्चियों के परिजनों ने मांग की है कि इस तरह के मामलों की सुनवाई के लिए चार्जशीट पेश होने के बाद से समय सीमा तय कर देनी चाहिए, कि इतने दिनों में कोर्ट को मामले का निस्तारण करना होगा। तभी समय पर बेटियों का इंसाफ मिल सकेगा।
Tags: फांसीबेटियांसर्वोच्च न्यायालय

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