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सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस: अधिनस्थ पुलिसकर्मियों पर लटकी सुप्रीम तलवार, बरी हुए 22 आरोपियों को नोटिस जारी

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उदयपुर,एआर लाइव न्यूज। सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस में बरी हुए अधिनस्थ पुलिसकर्मियों सहित 22 आरोपियों पर सुप्रीम कोर्ट की तलवार लटकी है। सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने सोमवार को मामले की सुनवायी करते हुए ट्रायल के दौरान 92 गवाहों के होस्टाइल होने पर चिंता जाहिर की और बरी हुए सभी 22 आरोपियों को नोटिस जारी किए हैं। | Sohrabuddin Encounter Case | Supreme Court Hearing Sohrabuddin Encounter Case

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवायी के दौरान यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह मामले में अमित शाह को डिस्चार्ज किए जाने को चुनौती देने वाले किसी मामले को नहीं देखेगा।

ऐसे में मामले में केन्द्रीय गृहमंत्री तत्कालीन गुजरात गृहमंत्री अमित शाह सहित डिस्चार्ज हुए सभी आईपीएस गुजरात के आईपीएस डीजी बंजारा, राजकुमार पांडियन, अभय चूडास्मा, विपुल अग्रवाल, दिनेश एमएन सहित 16 आरोपी तो सुरक्षित माने जा सकते हैं।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह रूख ट्रायल कोर्ट से बरी हुए 22 आरोपियों जिनमें राजस्थान पुलिस के उदयपुर में एडि.एसपी अब्दुल रहमान (तत्कालीन इंस्पेक्टर), डूंगरपुर कोतवाली थानाधिकारी हिमांशु सिंह (तत्कालीन एसआई), बासवाड़ा में थानाधिकारी श्याम सिंह (तत्कालीन एसआई) सहित अधिनस्थ पुलिसकर्मी उदयपुर पुलिस डीएसटी एएसआई करतार सिंह, युदवीर सिंह (सेवानिवृत) सहित गुजरात, आंध्र प्रदेश के कुल 21 अधिनस्थ पुलिसकर्मी शामिल हैं, की चिंता बढ़ा सकता है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस तथ्य पर चिंता जताई कि मुकदमे के दौरान 92 गवाह पक्षद्रोही हो गए थे।

जस्टिस बागची ने कहा 92 गवाहों का पक्षद्रोही होना गंभीर चिंता का विषय है। हालांकि यह समान निष्कर्ष (concurrent finding) था, लेकिन यह देखा जाना चाहिए कि क्या मुकदमे की सुनवाई निष्पक्ष और न्यायपूर्ण थी।

चीफ जस्टिस ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की और कहा कि पीठ कुछ गवाहों के बयानों की जांच करना चाहेगी।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने दलील दी कि यह एक फर्जी मुठभेड़ का मामला था, वकील ने कोर्ट को यह भी बताया कि आरोपियों को बरी किए जाने का आधार गवाहों का पक्षद्रोही होना था और इसलिए मामले की दोबारा समीक्षा किए जाने की जरूरत है।

बरी किए गए कुछ आरोपियों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के.परमेश्वर ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि यह एक ऐसा मामला है, जिसमें निचली अदालत और हाईकोर्ट ने बहुत विस्तृत और तर्कपूर्ण निष्कर्षों के आधार पर बरी करने का फैसला सुनाया था।

जस्टिस बागची ने कहा, आपको हमारे विवेक को संतुष्ट करना होगा, क्योंकि इसमें गवाह पक्षद्रोही हुए हैं।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा हम नोटिस जारी करना चाहते हैं। हम कुछ गवाहों के बयानों को देखना चाहते हैं। हम खुद को संतुष्ट करना चाहते हैं।

परमेश्वर ने कोर्ट में कहा कि मामले की जल्द सुनवाई के लिए इसे सूचीबद्ध किया जा सकता है, क्योंकि आरोपी भी नहीं चाहते कि यह मामला लंबे समय तक उनके सिर पर लटका रहे।

केस की सुनवायी के दौरान ही पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अमित शाह को डिस्चार्ज किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाले याचिका को Re-Examine नहीं करेगे।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची दोनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 43 में प्रवेश नहीं करेगा और इस हिस्से की समीक्षा नहीं करेगा।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट में दाखिल अपील के दौरान मनीआर कल्पेश कुमार नाम के एक हस्तक्षेपकर्ता ने दिसंबर 2014 में ट्रायल कोर्ट द्वारा अमित शाह को मामले से डिस्चार्ज किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए एक आवेदन दायर किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले के पैराग्राफ 43 में इस आवेदन को खारिज कर दिया था। तब हाईकोर्ट ने कहा था कि बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले ही अमित शाह के डिस्चार्ज को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर चुके हैं और और आवेदनकर्ता ने यह आवेदन इन तथ्यों को छुपाते हुए दायर किया है।

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