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कोरोना v/s कम्यूनल वायरस : समाज और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को क्यों भूल रहा है मीडिया…?

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सुप्रीम कोर्ट और पीएम मोदी की बात को अनसुना कर क्यों मीडिया समाज में नफरत फैला रहा है.?

क्यों मोदी की बात को ही छुटभैये नेता नहीं मान रहे.?

मॉब लिंचिंग से संबंधित घृणित वीडियो को मीडिया चैनल्स बार-बार चलाकर लोगों की मानसिकता को दूषित करने पर क्यों तुले हुए हैं.?

लकी जैन, (ARLive news) । कोरोना महामारी से जहां पूरा देश और विश्व जूझ रहा है और एक-दूसरे का मोरल सपोर्ट बनकर इस मुश्किल घड़ी से बाहर निकलने का प्रयास कर रहा है, उन परिस्थितियों में देश में कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक वायरस को मीडिया फैलाने में लगा हुआ है। यह वायरस है “साम्प्रदायिकता का वायरस”। कोरोना के लिए तो पूरी दुनिया के वैज्ञानिक वैक्सीन बनाने में जुटे हैं और शायद उन्हें जल्द ही सफल परिणाम भी मिल जाएं, लेकिन भारत में फैल रहे इस वायरस का कोई वैक्सीन या टीका नहीं बन सकता..!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार देश की जनता और मीडिया को यह संदेश दे रहे हैं कि कोरोना जब अटैक करता है तो जाति, धर्म, रंग देखकर नहीं करता है। देश इस विपदा की घड़ी में कोरोना को हराने के लिए एकसाथ खड़ा है। इसके बावजूद देश के मीडिया चैनल्स इसे हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बनाने में लगे हैं। अपने मुद्दे को चलाने, टीआरपी बढ़ाने और स्टूडियो में चार लोगों में बहस करवाने के लिए जब किसी बड़े नेता का बयान नहीं मिल रहा है तो मीडिया छुटभैये नेताओं के पास जाकर भड़काउ बयान ले रहे हैं और उन्हें घंटों चलाकर एक ही तरह की बात जनता की दिमाग में डालकर अपना मुद्दा चला रहे हैं।

सोमवार को मीडिया के भड़काउ कवरेज ने फिर उस वक्त देश के हर पत्रकार को शर्मिंदा किया, जब उसने महाराष्ट्र के पालघर में मॉब लिंचिंग में हुई दो साधुओं और उनके चालक की बर्बर हत्या को भी साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया। जबकि यह हिंदू-मुस्लिम मुद्दा था ही नहीं। यहां बच्चा चोरी के गिरोह की अफवाह पर भीड़ ने साधुओं को पीटना शुरू कर दिया था। मीडिया का तर्क रहता है कि नेता, जनप्रतिनिधि ने बयान दिया है, तो मीडिया से सवाल है कि क्या वह अपने खुद के सेंसर ने उस बयान को हटा नहीं सकती.? क्यों वह ऐसे बयान चला रही है, जो न ही देश हित में हैं और न ही मीडिया की साख के हित में है.?

वैसे भी इस बर्बरतापूर्वक हत्या करने वाली भीड़ का कोई धर्म नहीं हो सकता। ये न तो हिंदू हो सकते हैं, न ही मुसलमान। क्यों कि इस घटना ने देश की आत्मा को आहत किया है।

हद है कि टीवी चैनल्स ने विश्व में फैल रही कोरोना महामारी का भड़काउ एपीसोड चला-चला कर भारत में मानो कोरोना का धर्म ही निर्धारित कर दिया.? तबलीगियों के मुद्दे पर तो ऐसी साम्प्रदायिकता फैलाई, कि सब्जी भी हिंदू-मुस्लिम की हो गयी..! यूपी में तो फेक न्यूज को कुछ मीडिया चैनल्स ने जोर-शोर से चिल्ला-चिल्लाकर चलाया, बाद में परेशान होकर उत्तर प्रदेश की पुलिस को ही इन झूठी खबरों को एक्सपोज करना पड़ा। जब मामले दर्ज होने की पुलिस ने चेतावनी दी तो मीडिया चैनल्स को फेक न्यूज के वीडियो और खबरें हटानी पड़ गयी। टीवी चैनल्स साम्प्रदायिकता के लिए नया मुद्दा तलाश रहे थे, कुछ नहीं मिल रहा था, तो मॉब लिंचिंग को ही साम्प्रदायिक रंग देने में लग गए..!

सूचना प्रसारण मंत्रालय क्यों नफरत फैलाने वाले मीडिया चैनल्स पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है.?

मॉब लिंचिंग के मामलों में पूर्व में भी सुप्रीम कोर्ट यह गाइडलाइन्स जारी कर चुका है कि मॉब लिंचिंग से संबंधित घृणित वीडियो को मीडिया को नहीं चलाना चाहिए। लेकिन इसके बावजूद उन वीडियो को टीवी चैनल्स बार-बार चलाकर लोगों की मानसिकता को दूषित करने पर तुले हुए हैं।

हिंदुत्व के मुद्दे पर अग्रसर रहने वाले भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ भी अभी जनता से यही गुजारिश कर रहे हैं कि एकता के साथ कोरोना से जंग लड़नी है। इसी कारण उत्तर प्रदेश की पुलिस ने मीडिया चैनल्स द्वारा फैलाए गए झूठ को एक्सपोज भी किया।

लेकिन इसके बावजूद कभी तबलीगी के नाम पर तो कभी किसी और बहाने से मीडिया जगत के कुछ पत्रकार अपने प्रबंधन द्वारा चलाए जा रहे एजेंडे के तहत छुटभैये नेताओं से भड़काउ बयान लेकर उन्हें घंटों चला रहे हैं और इस कोरोना काल में भी साम्प्रदायिक माहौल बना रहे हैं। मीडिया चैनल्स के प्रबंधनों से भी सवाल है कि वे क्यों साम्प्रदायिक बयान-बाजियों को दरकिनार नहीं कर रहे हैं.? अगर किसी छुटभैये नेता ने भड़काउ या विवादित बयान दे भी दिया है तो वे क्यों इसे सेंसर लगाकर काट नहीं देते.? सवाल सूचना प्रसारण मंत्रालय से भी है कि वे क्यों इस प्रकार से नफरत फैलाने वाले मीडिया चैनल्सपर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है.?

सवाल यहां यह भी है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार देश को एकता बनाए रखने का संदेश दे रहे हैं, तो छुटभैये नेता उनकी बात को क्यों नहीं समझ रहे हैं.? सबसे अहम बात कि मीडिया संस्थान जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हर बात को गंभीरता से लेते हैं, तो उनकी इस बात को अनसुना क्यों कर रहे हैं.?

क्यों मीडिया चैनल्स समाज में नफरत फैला रहे हैं.? कोरोना जैसी महामारी के दौर में आखिर क्यों मीडिया चैनल्स एक ऐसे समाज को जन्म देने में लगे हैं, जहां किसी पर किसी को भरोसा नहीं है, जहां हर आदमी डरा हुआ है, जहां हर आदमी असुरक्षित महसूस कर रहा है..!

सवाल मीडिया संस्थानों से यह भी है कि उनकी खुद की पीढ़ियां, उनके बच्चे और परिवार भी तो इसी समाज का हिस्सा हैं, तो वे कैसे और किस अंधी दौड़ में अपने ही बच्चों के लिए यह असुरक्षा और नफरत से भरे समाज तैयार कर रहे हैं.? क्यों वे अपने परिवार, अपने बच्चे, अपने पवित्र प्रोफेशन पत्रकारिता, अपने समाज और अपने देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भूल रहे हैं.? 

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