हकीकत जो हर नागरिक को सोचने पर मजबूर कर देगी: खबर के आखिरी में किताब का 12 पेज का यह पूरा चैप्टर उपलब्ध है
लकी जैन/उदयपुर,एआर लाइव न्यूज। झीलों, पहाड़ों के संरक्षण के लिए कार्यरत पत्रकार और एक्टिविस्ट का अक्सर इस सच्चाई से सामना होता है कि कैसे पैसे के दम पर पहाड़ों को रौंदा जा रहा है, झीलों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है, लेकिन जब सिस्टम के अंदर का अधिकारी ही एक ऐसी हकीकत बयां करे जिसे न सिर्फ जनता के लिए जानना जरूरी है, बल्कि भविष्य में झील और पहाड़ों के संरक्षण के लिए जागरूक रहना और आवाज उठाना भी जरूरी होगा। | udaisagar lake five star hotel
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और उदयपुर यूआईटी (वर्तमान यूडीए) के पूर्व सचिव रामनिवास मेहता द्वारा उनके प्रशासनिक अनुभवों पर लिखी किताब “डर, साहस और भी बहुत कुछ..” के अध्याय 19 ने उदयसागर झील में पांच सितारा होटल निर्माण के रहस्य की पर्तें उधेड़ कर रख दी हैं।
रामनिवास मेहता ने चैप्टर की शुरूआत ही इस पैराग्राफ से की है…“उदयपुर के कार्यकाल के दौरान मैंने देखा कि पैसे वाले कैसे झीलों और पहाड़ों को रौंद कर वहां किस प्रकार लोक लुभावने होटल और रिसोर्ट बना प्राकृतिक सौंदर्य के साथ खिलवाड़ करते हैं।”
8.14 हेक्टेयर के टापू पर होटल बनाने की शुरुआत
रामनिवास मेहता की किताब के अनुसार, उदयसागर झील में करीब 8.14 हेक्टेयर का एक टापू है, जहां वर्ष 2009 तक खेती होती थी। मुंबई की एक कंपनी ने इस टापू को खरीदा था। तब पर्यटन विकास नीति के तहत होटल निर्माण के लिए उदयपुर यूआईटी से भूमि का निशुल्क संपरिवर्तन कराया गया था और निर्माण कार्य शुरू हो गया।
किताब में बताया कि, होटल तक बारहमासी सड़क बनाने के लिए झील के एक हिस्से में मिट्टी का भराव किया जाने लगा। इसे रोकने के लिए तत्कालीन प्रशासनिक और यूआईटी अधिकारियों ने प्रयास किए, जिसके बाद मामला न्यायालय तक पहुंच गया था।
हाईकोर्ट ने निरस्त किया था लैंड कन्वर्जन, होटल कंपनी पर लगाया था 1 करोड़ का जुर्माना
मेहता की किताब में उल्लेख है कि झीलों के संरक्षण को लेकर दायर जनहित याचिका में जोधपुर हाईकोर्ट के निर्देशों की पालना नहीं होने पर वर्ष 2010 में अवमानना याचिका दायर की गई। सितंबर 2012 में जोधपुर हाईकोर्ट ने उदयसागर झील के बीच बने टापू के लैंड कन्वर्जन और होटल निर्माण की स्वीकृति को निरस्त कर दिया था।
हाईकोर्ट ने उस समय हुए निर्माण को हटाने और झील को नुकसान पहुंचाने के लिए होटल निर्माणकर्ता पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने का फैसला भी सुनाया था। हाईकोर्ट में कंपनी की ओर से तत्कालीन वकील जगदीप धनखड़ ने पैरवी की थी, जो बाद में देश के उपराष्ट्रपति बने।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी
होटल निर्माणकर्ता कंपनी हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। मेहता की किताब के अनुसार, लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यूआईटी को उदयसागर झील के बीच बने टापू पर होटल निर्माण की स्वीकृति के साथ कार्गो और पर्यटक नौकाओं तथा 20 मीट्रिक टन की व्यावसायिक नाव चलाने और उनकी जेटी बनाने की अनुमति देनी पड़ी थी।
अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगाने पड़े
रामनिवास मेहता की किताब के अनुसार, होटल निर्माणकर्ताओं की ओर से नियमों के उल्लंघन पर जब-जब तत्कालीन यूआईटी अधिकारियों ने कार्रवाई का प्रयास किया, तब-तब कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
किताब में बताया गया है कि होटल स्वामी की ओर से दायर कंटेंम्प्ट पिटीशन में तत्कालीन सात अधिकारियों, जिनमें स्वयं रामनिवास मेहता सहित तीन आईएएस अधिकारी, दो तहसीलदार और सिंचाई विभाग के एक कार्यपालक अभियंता शामिल थे, को नोटिस जारी हुए। मेहता के अनुसार, इन अधिकारियों को कई बार सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित होना पड़ा और किताब लिखे जाने तक करीब दस वर्ष बाद भी यह याचिका लंबित थी।
निर्माण स्वीकृति के नवीनीकरण नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट ने मेहता पर लगाया था जुर्माना
मेहता लिखते हैं कि वेटलैंड रूल्स 2010 के उल्लंघन पाए जाने पर उन्होंने होटल निर्माण स्वीकृति के नवीनीकरण के आवेदन को खारिज किया था। इसके बाद कंपनी फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
किताब के अनुसार, अक्टूबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने रामनिवास मेहता पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया और होटल निर्माण स्वीकृति का नवीनीकरण करने का आदेश दिया था।
मेहता ने अपनी किताब में लिखा है कि इन निर्माण स्वीकृतियों के साथ करीब 450 वर्ष पुरानी उदयसागर झील का शांत और नैसर्गिक प्राकृतिक सौंदर्य हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
पर्यावरण के लिए संरक्षण पर लेखक ने उठाया सवाल
रामनिवास मेहता ने अध्याय के अंत में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े न्यायिक फैसलों के आलोचनात्मक मूल्यांकन की जरूरत बताई है। उनका सुझाव है कि यदि भारतीय न्यायालयों के पर्यावरण संरक्षण संबंधी फैसलों पर कोई शोध किया जाता है तो उस शोध में सुप्रीम कोर्ट के 29 दिसंबर 2025 के अरावली की परिभाषा से जुड़े आदेश और उदयसागर झील के टापू पर होटल निर्माण की स्वीकृति से जुड़े आदेश को भी शामिल किया जाना चाहिए।
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