बिना बड़ी सर्जरी के निकाली 5×8 सेमी की गांठ
उदयपुर,एआर लाइव न्यूज। प्राइमरी एनोरैक्टल मैलिग्नेंट मेलेनोमा, जिसे आम बोलचाल में ‘ब्लैक पिगमेंट कैंसर’ कहा जाता है, बेहद रेयर और आक्रामक कैंसर है। शुरुआती लक्षण सामान्य बवासीर, स्किन टैग या अन्य गुदा संबंधी समस्याओं जैसे होने के कारण कई बार इसका निदान देर से हो पाता है। ऐसे ही एक चुनौतीपूर्ण मामले का गीतांजलि हॉस्पिटल, उदयपुर में सफल उपचार किया गया है। | Black Pigment Cancer Treatment in Geetanjali hospital Udaipur
गीतांजलि हॉस्पिटल के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. पंकज गुप्ता, कैंसर सर्जन डॉ. आशीष झकेटिया और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के डॉ. कार्तिकेय माथुर के नेतृत्व में 51 वर्षीय मरीज का उपचार किया गया। मरीज करीब एक वर्ष से मलद्वार से रुक-रुक कर रक्तस्राव, जलन और असहजता की समस्या से परेशान था।
समय पर पहचान और सही स्टेजिंग बेहद महत्वपूर्ण
जांच के दौरान एनल क्षेत्र में करीब 5×8 सेंटीमीटर की बड़ी पॉलीप जैसी संदिग्ध गांठ मिली। चिकित्सकों ने नवीन तकनीक का इस्तेमाल करते हुए बिना बड़ी सर्जरी के गांठ को गुदा द्वार के माध्यम से बाहर निकालकर जड़ से हटा दिया। खास बात यह रही कि मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता नहीं पड़ी और कुछ ही घंटों में उसे घर भेज दिया गया। आगे की विस्तृत जांच में शरीर के अन्य हिस्सों में कैंसर फैलने यानी मेटास्टेसिस का कोई प्रमाण नहीं मिला।
चिकित्सकों के अनुसार एनोरैक्टल मैलिग्नेंट मेलेनोमा तेजी से फैलने की क्षमता रखने वाला कैंसर है। इसलिए इसकी समय पर पहचान और सही स्टेजिंग बेहद महत्वपूर्ण है। बीमारी की स्थिति का आकलन करने के लिए MRI और CT स्कैन जैसी उन्नत जांचें आवश्यक हो सकती हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि इस कैंसर का प्रमुख उपचार प्रभावित हिस्से को पूरी तरह हटाने वाली सर्जरी है। कुछ परिस्थितियों में इसके लिए कृत्रिम मलद्वार (कोलोस्टॉमी) की आवश्यकता पड़ सकती है। वहीं, कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी की भूमिका रोग की स्थिति और स्टेज के आधार पर सीमित या सहायक हो सकती है।
रक्तस्राव और गांठ को नजरअंदाज न करें
डॉक्टरों ने लोगों से अपील की है कि मलद्वार से रक्तस्राव, गांठ, दर्द, जलन या लंबे समय तक बनी रहने वाली असामान्य परेशानी को केवल बवासीर मानकर नजरअंदाज न करें। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है।
चिकित्सकों के मुताबिक समय पर जांच होने से बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में की जा सकती है और उपचार के बेहतर विकल्प मिल सकते हैं। उपचार के बाद नियमित फॉलो-अप और समय-समय पर जांच भी जरूरी है, ताकि बीमारी की पुनरावृत्ति या शरीर के अन्य हिस्सों में फैलाव का जल्द पता लगाया जा सके।
गीतांजलि हॉस्पिटल में सामने आया यह मामला दुर्लभ एनोरैक्टल कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ यह संदेश भी देता है कि लगातार बने रहने वाले गुदा संबंधी लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

