Site iconSite icon AR Live News

होली की अनोखी परंपराः दूल्हा लड़का, तो दुल्हन भी एक लड़का, दो लड़कों की आपस में करवाई जाती है शादी

holi festival ritual of two boys marriage in banswara vagad area rajasthanholi festival ritual of two boys marriage in banswara vagad area rajasthan

लेख : हेमंत शर्मा, बड़ोदिया, बांसवाड़ा

उदयपुर,(एआर लाइव न्यूज)। होली खुशियों का त्योहार है, हर व्यक्ति एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर प्रेम और सौहार्द का संदेश देता है, खासबात है कि होली का त्योहार भी अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग ढंग और परंपराओं (holi festival ritual) से मनाया जाता है। कहीं लट्ठ होली होती है, तो कहीं फूलों की होली, ऐसी ही एक परंपरा वागड़ क्षेत्र की है, जो बहुत ही अनोखी परंपरा है।

वागड़ में एक ऐसा गांव है, जहां होली पर शादी करवाई जाती है, लेकिन खास यह है कि इस शादी में दूल्हा भी लड़का होता है, तो दुल्हन भी एक लड़का ही होता है। बांसवाड़ा जिले के बड़ोदिया कस्बे में होली पर एक ऐसी ही शादी की परंपरा का आयोजन होता है। यह आश्चर्यजनक परंपरा का निर्वहन हर साल होता है। हालां कि यह शादी वास्तविक शादी नहीं होकर, मात्र एक परंपरा के निर्वहन के रूप में होती है। यहां पुरखों की इस परंपरा का निर्वहन आज भी पूरे सम्मान और श्रद्धाभाव से किया जाता है। इस रस्म का जीवंत नजारा होली पर बांसवाड़ा जिले के निंबाहेड़ा दोहद राजमार्ग पर स्थित बड़ोदिया गांव में होली की पूर्व रात्रि को देखने का मिलता है।

गांव के मुखिया के नेतृत्व में रात को दो अविवाहित लड़कों को खोजा जाता है

वर्षों से इस गांव में अनवरत चली आ रही इस परम्परा के तहत चौदस की रात्रि को गांव के मुखिया के नेतृत्व में युवाओं का एक समूह (जिसे वागड़ी भाषा में गेरिया कहा जाता है) ऐसे दो अविवाहित बालकों को खोजने निकलता है, जिनका कि यज्ञोपवित संस्कार न हुआ हो। जन मान्यताओं के चलते ऐसा जरूरी है कि सम्मिलित बालक न तो विवाहित हो, न ही यज्ञोपवीतधारी हो।

रात्रि में ढोल की थाप के साथ नाचते गाते गेरियों का समूह शादी योग्य दो बालकों को ढूंढने के उद्देश्य से सारे गांव की सैर करता है। रास्ते में घूमता जो भी बालक पहले मिलता है, उसे वर और और इसके बाद मिलने वाले बालक को वधु बनाया जाता है। गेरियों का समूह दोनों बालकों को लेकर गांव के मध्य स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर पर पहुंचता है। मंदिर में शादी का मंडल पहले से ही तैयार होता है। गेरियों के समूह में शामिल पण्डित वर-वधु बनाए गए दोनों लड़कों की सम्पूर्ण रस्मों के साथ शादी करवाते हैं। मण्डप में हवन वेदिका भी होती है और दुल्हा-दुल्हन के फेरे भी। इस दौरान उपस्थित गैरिये ढोल-तासों की संगत के साथ शादी-ब्याह के गीत गाते है व मौज मस्ती करते हैं।

शादी के बाद तड़के गांव में निकलता है बिलौना

शादी की यह रस्म अदायगी सारी रात चलती है और तड़के वर-वधू बने दोनों बालकों को बैलगाड़ी में बैठाकर गांव भर में बिनौला निकाला जाता है। बिनौले को देखने के लिये ग्रामीणजन भी उत्साहित दिखाई पड़ते है। बिनौले की रस्म दौरान शादी में सम्मिलित होने वाले सभी लोग बारी-बारी से वर-वधू बने बालकों के घर पहुॅंचते है व शादी की खुशी की मिठाई रूप में शक्कर अथवा नारीयल की चटख का प्रसाद ग्रहण करते है।

ऐसे शुरू हुई परंपरा

प्रहसन रूप में ही सही पूरी श्रद्धा से संपादित की जाने वाली इस परंपरा के पीछे सामाजिक एकता बढ़ाने का प्रगाढ़ उद्देश्य छुपा हुआ है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि पहले इस गांव में खेडुवा जाति के लोग रहा करते थे तथा गांव के ठीक मध्य में ही एक नाला बहता था जो गांव को दो भागों में बांटता था। उस समय प्रत्येक भाग से एक एक बालक इस तरह की शादी में स्वेच्छा से दिया जाता था।

माना जाता था कि दोनों भागों के लड़कों की आपस में शादी हो जाने पर दोनों भागों में पारिवारिक संबंध स्थापित हो जाता है और इसके चलते दोनों भागों के वाशिंदों में किसी प्रकार का बैरभाव नहीं रहता है। इसी मान्यता के चलते दोनों भागों के लोग होली पर्व पर सांस्कृतिक एकता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से सदियों से इस परंपरा का संपादन करते हैं।

यह भी पढ़ें : होली से पहले इन लोगों के सपने हुए पूरे

डिसक्लेमर: एआर लाइव न्यूज(AR Live News)से मिलते-जुलते नामों से रहें सावधान, उनका एआर लाइव न्यूज से कोई संबंध नहीं है। एआर लाइव न्यूज के संबंध में कोई भी बात करने के लिए पत्रकार लकी जैन (9887071584) और पत्रकार देवेन्द्र शर्मा (9672982063) ही अधिकृत हैं।

Exit mobile version