संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय की चेतावनी : भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी में फंस सकते हैं..!
निम्न-मध्यम वर्ग के परिवारों पर पड़ेगी सीधी मार…!
लकी जैन,(ARLive news)
देश में केन्द्र सरकार और करीब-करीब सभी राज्य सरकारों ने लॉक डाउन को बढ़ाने की ओर इशारा किया है। राज्यों में बढ़ रहे कोरोना संक्रमण की स्थिति के अनुसार निर्णय लिया जाएगा, लेकिन ये स्थिति सरकार और देश की जनता के लिए आगे कुआं पीछे खाई की तरह हो गयी है। लॉकडाउन नहीं करें तो कोरोना संक्रमण का खतरा जिंदगियों को लीलने के लिए खड़ा है और लॉकडाउन कर दिया तो बेरोजगारी और भुखमरी से न जाने कितने जिंदगियां खत्म होगी इसका तो अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता।
संयुक्त राष्ट्र के श्रम निकाय ने भी अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि कोरोना महामारी संकट के कारण भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लगभग 40 करोड़ लोग गरीबी में फंस सकते हैं।
40 करोड़ जनता..! देश में 130 करोड़ जनसंख्या है, इस अनुसार हर तीसरा-चौथा आदमी गरीबी के दलदल में फंस सकता है। इस 40 करोड़ में मध्यवर्गीय परिवारों में जो “निम्न-मध्यमवर्गीय” हैं, उनकी संख्या भी काफी ज्यादा हो सकती है। यह स्थिति सुनने में ही भयाभय हैं। लेकिन हालातों की समीक्षा कर रहे विशेषज्ञ इसे भविष्य की हकीकत बता रहे हैं। आने वाले दिनों में सरकारें लॉक डाउन को बढ़ाने पर विचार कर रही हैं। लॉक डाउन जितना ज्यादा बढ़ता जाएगा, जनता के लिए आर्थिक समस्याएं भी बढेंगी।
पहले लॉकडाउन की सीधी मार गरीब परिवारों पर पड़ी थी, अब लॉकडाउन अवधि बढ़ने का सीधा असर “निम्न-मध्यम वर्गीय” परिवारों पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहले लॉकडाउन की घोषणा की सीधी मार गरीब परिवारों पर पड़ी थी, जो रोज कमाते और रोज खाते हैं। लॉकडाउन की अचानक हुई घोषणा में यह वर्ग सड़क पर आ गया था। जैसे-तैसे सरकारों ने इन्हें तो रोक लिया, कुछ तक राशन गेहुं, दालें अनाज भी पहुंचा दिया। लेकिन अब जो लॉकडाउन अवधि बढ़ने की घोषणा होगी, उसका सीधा असर निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों पर होगा। समाज में रहने वाले विभिन्न वर्ग में निम्न मध्यम वर्ग वह है, जिसका आदमी इज्जत और शर्म के कारण न तो मदद मांग पाता है और जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने में उसकी कोई खास बचत भी नहीं हो पाती है।
ये निम्न मध्यमवर्गीय परिवार 10 से 20 हजार रूपए महीन कमाते हैं, पूरी जिंदगी होने वाली आय को वे हर महीने परिवार की जरूरतों को पूरा करने में लगा देते हैं। इनके घर के राशन से लेकर, बिल भरते तक सभी जरूरतों का हिसाब मासिक आय के आधार पर महीने में सूचीबद्ध तरीके से मासिकवार ही होता है और हां इस वर्ग की कभी कुछ खास बचत भी नहीं हो पाती है। चूंकि मार्च में कमाई नहीं होने से इस वर्ग ने जैसे-तैसे मार्च महीने और अप्रेल अब तक का लॉक डाउन तो निकाल लिया। लेकिन अगर लॉकडाउन की अवधि बढ़ी तो यह निम्न मध्यमवर्गीय परिवार मुसीबत में पड़ जाएंगे।
लॉक डाउन में अगर वेदांता ग्रुप का हिंदुस्तान जिंक चल सकता हैं तो अन्य फैक्ट्री और माइंस क्यों नहीं…?
सरकारों को इस ओर कोई न कोई रास्ता निकालना चाहिए। सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखते हुए थोड़े-बहुत काम शुरू करने का रास्ता निकल सकता है, तो सरकारों को इस ओर भी सोचना चाहिए।
- जनता कर्फ्यू से लेकर अब तक के लॉकडाउन के दौरान और आगे भी अगर देश में वेदांता ग्रुप की हिंदुस्तान जिंक की माइंस, प्लांट, फैक्ट्रियों में 2000 और इससे अधिक मजदूर काम कर सकते हैं तो ऐसी अन्य छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां भी सोशल डिस्टेंसिंग सहित कुछ शर्तों शुरू करवायी जा सकती हैं।
- फैक्ट्रियां जहां बड़ी संख्या में मजदूर काम करते हैं, वहां स्वास्थ्य परीक्षण करते हुए उन्हें शुरू किया जा सकता है।
- भवन निर्माण के बडे़ प्रोजेक्ट जहां मजदूर वहीं झोपड़ी बना कर रहते हैं, तो वहां भी उनके खाने-पीने का इंतजाम करते हुए काम शुरू करवाया जा सकता है।
- उन राज्य और जिलों को भी राहत दी जा सकती है, जहां कोरोना का एक भी केस चिह्नित नहीं हुआ, इससे कोरोना काल में कुछ लोग ही सही, किसी को तो राहत मिलेगी। कुछ जिले ही सही, जीवन सामान्य होने की तरफ बढ़ेगा तो सही…!’
ऐसे कई रास्ते और सुझाव हैं, जो सरकार अपनी विषेषज्ञों और सलाहकारों के जरिए लागू कर जीवन को पटरी पर लाने की शुरूआत हो सकती है।

