लकी जैन,(ARLive news)। 7-8 साल का बच्चा, जिसका दुनिया में कोई नहीं है, वह चाइल्ड केयर होम (निराश्रित गृह) में पहुंचता है, अब वही उसका घर हो जाता है, वहां रहने वाले अन्य बच्चे और वहां का स्टाफ उसका परिवार। लेकिन जैसे-जैसे वह 18 वर्ष की आयु के करीब पहुंचता है उसे हर दिन एक चिंता सताती है कि वह 18 वर्ष का होने के बाद कहां जाएगा। सरकारी नियमों के कारण चाइल्ड केयर होम में रहने वाले बच्चों के मन में एक डर हमेशा रहता है कि वे जिस केयर होम को अपना घर समझने लगे है, 18 साल की उम्र होने पर उन्हें वह घर छोड़ना पड़ेगा। वे फिर एक बार सड़क पर आ जाएंगे।
मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान विभाग की एचओडी प्रो. कल्पना जैन ने बताया कि 18 साल यह उम्र ऐसी होती है, जब बच्चे को सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है, नहीं तो उसके भटकने, गलत संगति की तरफ बढ़ जाने की संभावना ज्यादा होती है। शारीरिक और मानसिक रूप से बच्चे में इस उम्र में कई बदलाव हो रहे होते हैं। जिन्हें समझकर उसका मार्गदर्शन करना जरूरी होता है। इस उम्र में उसे अकेला छोड़ना ठीक नहीं होगा। कोई ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि बच्चा 18 साल के बाद वहां रह सके, रोजगार की तरफ उन्मुख हो, उच्च शिक्षा ले और अपना सही भविष्य सुनिश्चित कर सके।
अकेलेपन की भावना बच्चे में भटकाव ला सकती है
महाराणा भूपाल हॉस्पिटल के मनोचिकित्सा विभाग के एचओडी डॉ. सुशील खैराड़ ने बताया कि भारतीय एजुकेशन सिस्टम ऐसा है जिसमें 18 साल की आयु तक तो बच्चे की स्कूल शिक्षा ही पूरी होती है। इस उम्र में बच्चा न तो शारीरिक रूप, न ही मानसिक रूप से इतना मजबूत होता है कि वह दुनिया में अकेला सर्वाइव कर सके। इस उम्र में बच्चे को छोड़ना उसमें असुरक्षा लाएगा। इस स्थिति में बच्चा अवसाद में भी जा सकता है और चोरी, नशा या अन्य किसी अपराध और असामाजिक गतिविधि की तरफ भटक सकता है। इस उम्र में बच्चे को सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। ऐसी सरकारी योजनाएं होनी चाहिए कि बच्चा रोजगार से जुड़ सके, उच्च शिक्षा ले सके। आने वाले समय और चुनौतियों के लिए उसकी प्रोपर काउंसलिंग और मार्गदर्शन हो।
इन्हीं संभावनाओं और बच्चे के भविष्य को देखते हुए उदयपुर की सीडब्ल्यूसी ने एक अच्छी पहल की। निराश्रित गृह में पले-बढ़े दो बच्चों को उनके 18 साल की आयु होने के बाद भी केयर होम में रहने की अनुमति दिलवायी और उनकी उच्च शिक्षा के प्रयास किए।
एक बच्चा बीटेक कर रहा है, तो दूसरा प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी
केस 1 : सीडब्ल्यूसी के पूर्व सदस्य हरीश पालीवाल ने बताया कि उदयपुर के जीवन ज्योति गृह में पिछले 10 सालों से रह रहा ओम (परिवर्तित नाम) 2018 में 18 साल का हो गया था। वह आगे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहता था, लेकिन जीवन ज्योति गृह छोड़कर जाना उसकी मजबूरी बन गयी थी। वह कहां जाए उसे समझ नहीं आ रहा था। तब उदयपुर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) ने महिला एवं बाल अधिकारिता विभाग के साथ पत्राचार कर लगातार कोशिश की और ओम को जीवन ज्योति गृह में 21 साल तक रहने की अनुमति दिलवायी। ओम जीवन ज्योति गृह में सभी कार्यों में हाथ बंटाता है, अन्य बच्चों का ध्यान रखता है, वहां रहकर खुद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है, ताकि सरकारी नौकरी में चयनित हो सके।
केस 2 : ऐसा ही नारायण सेवा संस्थान के आश्रय स्थल में रह रहे सोहन (परिवर्तित नाम) के साथ हुआ। सोहन की स्कूल शिक्षा पूरी हुई थी, वह बीटेक करना चाहता था, लेकिन 18 साल का होने के कारण उसे वह आश्रय होम छोड़कर जाना था। सीडब्ल्यूसी ने सोहन के लिए भी प्रयास किए और उसे भी वहां होम में ग्रेजुएशन पूरी होने तक रहने की अनुमति दिलवायी। सोहन बीटेक कर रहा है और इंजीनियर बनना चाहता है।
नियम : 18 वर्ष की आयु तक ही केयर होम में रह सकता बच्चा
राजकीय किशोर गृह अधीक्षक केके चंन्द्रवंशी ने बताया कि कोई बच्चा जिसके माता-पिता या कोई संरक्षक नहीं है, वह 18 वर्ष की आयु तक ही चाइल्ड केयर होम में रह सकता है। नियम है कि चाइल्ड केयर होम में बच्चा 16 साल का हो तो उसे स्वाबलंबी कोर्स करवाया जाए, ये हर चाइल्ड केयर होम पर निर्भर करता है। कुछ ऐसे होते हैं जो बच्चे के 18 साल पूरे होने के बाद भी उसका फॉलोअप लेते हैं, मुख्यमंत्री हुनर योजना सहित अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ते हैं। लेकिन हर केयर होम में ऐसा नहीं होता, कुछ होम बच्चों को लेकर सिर्फ औपचारिक जिम्मेदारी निभाते है, वहां बच्चे के सामने 18 साल पूरे होने के बाद चुनौतियां ज्यादा आती हैं।
सुझाव : जरूरत है कि ऐसे बच्चों की उच्च शिक्षा के दौरान हॉस्टल हो
बाल अधिकारिता विभाग के अधिकारी ने बताया कि हर साल पूरे राज्य से ऐसे 250 से 300 बच्चे ही होते हैं जो चाइल्ड केयर होम में 18 वर्ष की आयु पूरी करते हैं और उनके माता-पिता नहीं होते हैं। ऐसे सुझाव आए हैं कि सरकार इन बच्चों के लिए राज्य स्तर या संभागीय स्तर पर एक हॉस्टल बनवाए, जहां ये बच्चे 18 से 21 वर्ष की आयु तक रह सकें और इस दौरान वे विभिन्न सरकारी योजनाओं के जरिए निशुल्क उच्च शिक्षा प्राप्त कर रोजगार से जुड़ सकें। आज के समय में इसकी जरूरत है और इस पर विचार चल रहा है।

