उदयपुर,(ARLive news)। ग्रामीण, आदिवासी अंचलों में व्यावसायिक तौर पर क्लीनिक खोलकर इलाज करने वाले डॉक्टर जरूरी नहीं कि एमबीबीएस ही हो, ये दसवीं पास भी हो सकते हैं, जो कि बहुउदेश्यीय सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (व्यावसायिक) का कोर्स करने के बाद लोगों का इलाज कर रहे हैं। ऐसे में उपचार के लिए जा रहा पीड़ित मरीज इस बात से सावचेत रहें कि उनका इलाज कौन कर रहा है, क्यों कि सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता तो मरीज के नस में इंजेक्शन लगाने के लिए भी अधिकृत नहीं होते हैं।
जिले के करीब 50 से अधिक ऐसे ही सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त निदेशक, सीएमएचओ, जिला एसपी सहित अन्य अधिकारियों को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि उन्हें झोलाछाप कहकर उन पर कार्यवाही नहीं की जाए। वे केन्द्र सरकार से सर्टिफाइड सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, ऐसे में पुसिल और प्रशासनिक अधिकारी उन्हें झोलाछाप मानकार कार्यवाही नहीं करें।
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता सर्टिफाइड हैं,तो जांच से क्यों डरे हैं
यहां सवाल यह भी है कि जब सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता सर्टिफाइड हैं और वे वही दवा मरीज को देते हैं और अपने पास रखते हैं, जो उनके लिए लिस्टेड की गयी हैं तो वे किसी जांच से क्यों डर रहे हैं..? उन्हें क्यों पुलिस कार्यवाही का डर सता रहा है..?
"ये लोग पुलिस की कार्यवाही से बचने के लिए ज्ञापन दे रहे हैं। अगर ये सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता सही हैं और नियमानुसार ही लोगों का इलाज करते हैं तो, इन्हें किस बात का डर है। इनके पास जो सर्टिफिकेट हैं, अगर ये उससे कहीं ज्यादा आगे बढ़कर लोगों का इलाज कर रहे हैं, उन्हें दवाईयां दे रहे हैं, तो इससे लोगों का जीवन खतरे में है और पुलिस इन पर कार्यवाही कर सकती है। इनकी संबंधित विभाग से पर्याप्त मॉनीटरिंग तक नहीं हो रही है।"
दिनेश रोहड़िया, एडि.एसपी
इनके सर्टिफिकेट को मान्यता नहीं
जिले के सीनियर हेल्थ ऑफिसर ने बताया कि सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, लेकिन इनके पास मौजूद सर्टिफिकेट या डिग्री मान्यता प्राप्त संस्था से एफीलिएटेड नहीं है। ऐसे में इनके डिग्री या सर्टिफिकेट की मान्यता नहीं है। जैसे एलोपैथी, नर्सिंग, होम्योपैथी, आयुर्वेदिक या यूनानी सभी उपचार पद्धतियों की संस्थाओं के लिए राजस्थान सरकार ने काउंसिल बनाई हुई हैं। राजस्थान मेडिकल काउंसिल, राजस्थान नर्सिंग काउंसिल है। ये काउंसिल डिग्री धारकों को सर्टिफाइड करते हैं। जैसे किसी छात्र ने नर्सिंग के लिए जीएनएम या एएनएम का कोर्स किया है। कोर्स के बाद यह छात्र अपनी डिग्री व दस्तावेज के जरिए काउंसिल में सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करेगा। काउंसिल छात्र की डिग्री को कॉलेज से वैरीफाई करता है, इसके बाद उसका सर्टिफिकेट जारी होगा।
लेकिन ये जो बहुउदेश्यीय सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, इनकी राज्य सरकार द्वारा गठित कोई काउंसिल नहीं है। ऐसे में इनकी डिग्री या सर्टिफिकेट की मान्यता नहीं होती है और ये इलाज नहीं कर सकते हैं।
इंजेक्शन लगाने के अधिकृत तक नहीं
बुखार, पेटदर्द, उल्टी दस्त की सामान्य समस्या में ही दवाई दे सकते हैं। ये वहीं दवा मरीज को दे सकते हैं, जो इनके लिए लिस्टेड की गयी हैं। सूची से अतिरिक्त कोई दवा या बीमारी का उपचार सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता किसी भी मरीज के नस में इंजेक्शन नहीं लगा सकते हैं। लेकिन पर्याप्त मॉनीटरिंग नहीं होने से यह पता नहीं चल पाता कि ये लिस्टेड दवाई ही दे रहे हैं या उससे कहीं ज्यादा…?
क्या पुलिस ही करे इस हकीकत की पड़ताल..?
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता प्रमाणपत्र लेने के बाद क्या वही दवा अपने पास रखते हैं जो लिस्टेड है..? इसकी मॉनीटरिंग कौन करता है..? वास्तविकता यह है कि इसकी कोई मॉनीटरिंग नहीं होती है।
ऐसे में पुलिस अधिकारी लिस्टेड दवाइयों की सूची लेकर इन सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की दुकानों और क्लीनिक पर छापे मारकर आकस्मिक चेकिंग कर सकते हैं। ताकि हकीकत सामने आ सके क्यों कि ब्लॉक-सीएमओ के स्तर पर पर्याप्त मॉनीटरिंग नहीं हो रही है, यही कारण है कि कई बार ऐसे मामले भी सामने आ चुके हैं, जिसमें गलत उपचार से मरीज की मृत्यु तक हो गयी।
सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता झोलाझाप चिकित्सक नहीं हैं। हालां कि ये वही दवाई दे सकते हैं, जो इनके लिए लिस्टेड की गयी हैं। उससे अतिरिक्त ये दवा या इलाज नहीं कर सकते हैं। अगर सामुदायिक स्वास्थ्य का प्रमाणपत्र नहीं है, तो वह झोलाछाप चिकित्सक हैं। दिनेश खराड़ी, सीएमएचओ
AR Live News सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का विरोध नहीं करता है, लेकिन चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से अपील करता है कि इनकी मॉनीटरिंग होनी जरूरी है, ताकि ये नियमानुसार ही उपचार करें..!

