कटारिया ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि महापौर अलग दल का और बहुमत किसी और दल का होगा तो उस निकाय का भगवान ही मालिक होगा। हमने जयपुर, कोटा आदि जगहों पर अनुभव किया था जो वास्तव में उस शहर के विकास के लिए उचित नहीं था। महापौर और पार्षदों के बीच की रस्साकशी में उस निकाय की हालत लावारिस सी हो जाती है जहां पर न समितियों का निर्माण होता है ना ही पार्षद अपने क्षेत्रों में कार्य करा पाते हैं। इसी को देखते हुए हमारी सरकार ने निर्णय लिया था कि दोनों ही एक ही दल के हो तो ही विकास संभव है।
कटारिया ने पंचायत राज और निकायों के चुनाव की शैक्षणिक योग्यता समाप्त करने के निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा कि हमारी सरकार ने शैक्षणिक योग्यता लागू की थी, क्यों कि हमारा सोचना था कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि का शिक्षित होना अनिवार्य होना चाहिए। यदि वह शिक्षित नहीं होगा तो दूसरों के कहे पर चलेगा, दूसरों के कहने पर दस्तखत करेगा, सही और गलत को परिभाषित करने में सक्षम नहीं रहेगा। हमारी सरकार के इस क्रांतिकारी निर्णय को देशभर में सराहा गया व इसे मॉडल मानते हुए कई राज्यों ने इस प्रकार के कदम उठाएं और उन्हें अपने राज्यों में लागू भी किए।
कटारिया ने कहा कि दोनों ही विषय राजनीति के नहीं है, अपितु स्वस्थ लोकतंत्र में इन दोनों ही विषयों पर एक खुली बहस होनी अति आवश्यक है। जनता भी इस पर अपना पक्ष रखे और निश्चित रूप से इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे। लोकतंत्र में इस प्रकार के निर्णय ठीक नहीं।
