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सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर : कोर्ट ने फैसले में लिखा सीबीआई ने पहले से गढ़ी कहानी में राजनेताओं को फंसाया

जज ने फैंसले में लिखा कि गवाहों के बयानों से पाया गया कि सीबीआई का अनुसंधान ही पॉलिटीकल मोटीवेटेड था।

मुंबई,(ARlive news)। सोहराबुद्दीन-तुलसी एनकाउंटर केस में सीबीआई स्पेशल कोर्ट के 21 दिसंबर को सुनाए गए फैंसले में स्पष्ट लिखा है कि केस को अनुसंधान सीबीआई ने पहले से गढ़ी हुई कहानी को स्टेबलिश करने के अनुसार किया था। हालां कि फैंसला सुनाने के आठ दिन बाद भी कोर्ट ने 350 पेज के फैंसले की पूरी कॉपी अभी तक जारी नहीं की है।

कोर्ट से प्राप्त जानकारी के अनुसार फैंसले के पेरा 209 में जज एसजे शर्मा ने लिखा है कि ट्रायल के दौरान गवाह होस्टाइल हुए, इसका मतलब हुआ कि उन्होंने जो स्टेटमेंट सीबीआई को दिए थे, वह नहीं लिखे गए। ट्रायल के दौरान ऐसा भी हुआ कि जब कोर्ट में गवाह ने स्पष्ट कहा कि वह अभी सत्य बोल रहा है, यह बयान यह भी स्पष्ट करता है कि अनुसंधान में सीबीआई ने जो बयान रिकॉर्ड किए, वह गवाह ने नहीं बोले थे। ट्रायल में गवाहों को सुनने के दौरान पाया कि सीबीआई ने अनुसंधान के दौरान अपराध के सत्य तक पहुंचने के बजाए पहले से सोची हुई और गढ़ी हुई कहानी को स्टेबलिश करने का प्रयास किया है।

फैंसले के इस पेरा में जज ने लिखा है कि सीबीआई की मंशा अमित शाह की केस में बनाई गई भूमिका से भी साबित हुर्ह। गवाहों के बयानों से पाया गया कि सीबीआई का अनुसंधान ही पॉलिटीकल मोटीवेटेड था। सभी गवाहों के बयानों और साक्ष्यों के आधार पर पाया गया कि सीबीआई पहले से गढ़ी हुई कहानी की स्क्रिप्ट में राजनेताओं को डाला था और इस कहानी को साबित करने के लिए उसी के अनुसार अनुसंधान किया। पूरे अनुसंधान में यही टारगेट रहा कि किस तरह से राजनेताओं को इस केस में उलझाया जाए। उसकी के अनुसार सीबीआई ने सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के बयान करवाए। ट्रायल के दौरान यह भी पाया गया कि सीबीआई ने अनुसंधान में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान तक नहीं दिया, उसे यह अनुसंधान पूरा करने की काफी जल्दबाजी थी। सीबीआई ने केस में कुछ ऐसे पुलिस कर्मियों को भी फंसाया, जिन्हें इसके षडयंत्र की भी जानकारी नहीं थी और वे बेकसूर पाए गए।

फैंसले के पेरा 210 में कोर्ट ने लिखा कि मुझे अफसोस है कि ऐसे गंभीर अपराध में किसी को सजा नहीं हुई, लेकिन कानून मुझे इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी को मोरल या संदेह के आधार पर सजा दे दी जाए। अभियोजन पक्ष पर हमेशा जिम्मेदारी रहती है कि वह अपना केस बिना किसी संदेह के साबित करे। लेकिन अभियोजन पक्ष ऐसा नहीं कर सका और इसी कारण कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को इस केस से बरी किया है।

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