सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में सीबीआई की पूरी कहानी मोटिव, साजिश से शुरू होकर उस तीसरे व्यक्ति पर टिकती है, जो सोहराबुद्दीन और कौसरबी के साथ था, लेकिन सीबीआई केस के आखिरी तक न तो मोटिव और साजिश साबित कर पाई और वह यह साबित भी नहीं कर पाई कि आखिरकार वह तीसरा आदमी था कौन।
सीबीआई ने सोहराबुद्दीन एनकाउंटर और कौसरबी के गायब होने की पूरी कहानी का मोटिव राजनैतिक-आर्थिक फायदा और इसमें क्रिमिनल-पॉलिटिकल-पुलिस कॉन्सपीरेसी होना बताया था। इस पूरे प्रकरण को हम छह अलग-अलग चरणों में देखें तो सीबीआई इसे साबित करने में हर चरण में असफल साबित हुई है। पहला चरण मोटिव, दूसरा चरण साजिश, तीसरा चरण सोहराबुद्दीन-कौसरबी का अपहरण, चौथा चरण इन दोनों को अवैध हिरासत में किसी फार्म हाउस में रखना, पांचवां चरण सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर और छठवां चरण कौसरबी की हत्या।
सीबीआई की कहानी के अनुसार सोहराबुद्दीन, कौसरबी 16-17 नवंबर 2005 में दोस्त कलीमुद्दीन से मिलने हैदराबाद गए थे। 22 से 23 नवंबर की रात वहां से वापसी के समय हैदराबाद से सांगली के बीच बस से सोहराबुद्दीन-कौसरबी सहित तीन लोगों का अपहरण कर अहमदाबाद लाया गया था, जहां 26 नवंबर 2005 की अल-सुबह सोहराबुद्दीन को फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया और इसके बाद कौसरबी की भी हत्या कर 29 नवंबर 2005 को डीजी बंजारा के गांव इलोल में उसकी लाश का जलाकर सबूत नष्ट कर दिए गए थे। सीबीआई की कहानी के अनुसार अपह्रित किया गया तीसरा आदमी तुलसी प्रजापति था, जो इस पूरी घटना का चश्मदीद गवाह होने के कारण 28 दिसंबर 2006 को उसे भी फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया था।
सीबीआई चार्जशीट में इन सभी छह चरणों से जुड़े मुख्य आरोपी राजनेता, व्यापारी और आईपीएस अधिकारी ट्रायल शुरू होने से पहले ही बरी हो चुके हैं। इससे यह तथ्य उजागर हुआ है कि सीबीआई अपनी ही बनाई कहानी को साबित करने में पूरी तरह नाकामयाब रही है। ट्रायल कोर्ट में केस पर चल रही अंतिम सुनवाई के आखिरी दिन खुद सीबीआई ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया है कि उनसे इन मामलों के अनुसंधान में कई खामियां रही हैं, वे केस की हर कड़ी को आपस में जोड़ने में नाकाम साबित हुए हैं, यही कारण रहा कि वे केस को प्रूव नहीं कर पाए, उनके 210 गवाहों में से स्टार विटनेस सहित 92 होस्टाइल हो चुके हैं, शेष बचे गवाहों में भी 40 से अधिक अनुसंधान अधिकारी व एफएसएल सांइंटिस्ट है।
सीबीआई ने जिन गवाहों को अपने स्टार विटनेस के तौर पर पेश किया था, इनके बयानों के आधार पर राजनेताओं, व्यापारियों और आईपीएस अधिकारियों सहित अन्य पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया, उनकी विश्वसनीयता पर ट्रायल शुरू होने से पहले ही प्रश्न चिह्न लग गया था, जब इस प्रकरण के हर चरण से जुड़े 16 मुख्य आरोपियों में शामिल न सिर्फ राजनेता बल्कि तीनों स्टेट से जुड़े आईपीएस अधिकारी भी बरी हो गए थे।
अब देखना यह है कि जब सेशन कोर्ट और हाईकोर्ट ने उन गवाहों के बयानों को राजनेताओं, व्यापारी और आईपीएस अधिकारियों के लिए विश्वसनीय नहीं मानते हुए उन्हें बरी किया है, तो वही होस्टाइल हो चुके गवाह ट्रायल भुगत रहे 21 अधिनस्थ पुलिस कर्मी सहित 22 आरोपियों के विरूद्ध कितने विश्वसनीय साबित होंगे।
पहला चरण – अपराध का उद्देश्य : सीबीआई की कहानी के अनुसार सोहराबुद्दीन अपने साथियों की मदद से एक्सटॉर्शन रैकेट चलाता था, उसने राजस्थान के मार्बल किंग आरके मार्बल के मालिक विमल पाटनी को एक्सटॉर्शन के लिए धमकी दी थी, इस व्यवसायी ने अपने राजनीतिक पहुंच का इस्तेमाल करते हुए राजस्थान व गुजरात के राजनेताओं गुलाब चंद कटारिया और अमित शाह से संपर्क किया था। उन राजनेताओं की सहायता से आईपीएस अधिकारियों डीजी बंजारा, राजकुमार पांडियन, दिनेश एमएन, अभय चूडास्मा की सहायता से इस अपराध को अंजाम दिया। सीबीआई चार्जशीट के मुताबिक इस अपराध को अंजाम देने के लिए बड़ी मात्रा में पैसे का लेन-देन हुआ था। इसलिए सीबीआई ने उक्त राजनेताओं और पुलिस अधिकारियों को आरोपी मानते चार्जशीट किया था।
पहले चरण में सीबीआई की असफलता : सीबीआई अपने अनुसंधान में न तो यह साबित कर पाई कि इस अपराध से किन-किन को किस प्रकार से राजनैतिक फायदा हुआ है और न ही यह साबित कर पाई कि आर्थिक लाभ किन-किन आरोपियों को हुआ, कितना आर्थिक लाभ हुआ। सीबीआई किसी भी आरोपी से इस आर्थिक लाभ के बारे में जानकारी प्राप्त करने और उसे बतौर वजह-सबूत मुकदमें में जब्त करने में पूरी तरह नाकामयाब रही है। गौरतलब है कि प्रकरण के मुख्य अनुसंधान अधिकारी सीबीआई के एसपी अमिताभ ठाकुर ने गत दिनों ट्रायल के दौरान कोर्ट में दिए अपने बयान में यह स्वीकार किया था कि प्रकरण में ट्रायल भुगत रहे 22 आरोपियों को किसी भी प्रकार का राजनीतिक या आर्थिक लाभ नहीं हुआ था और जो 16 आरोपी बरी हो चुके हैं, उनके खिलाफ इस संबध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे।
“हर दिन हम आपको इन छह चरणों के उन हर पहलू से अवगत करवाएंगे, जिसमें सीबीआई ने चार्जशीट में दावा तो किया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट में उन दावों को साबित करने में नाकाम रही। प्रकरण की दूसरे चरण की खबर श्रृंखला के दूसरे भाग में”
